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  • नक्सलबाड़ी : तब और अब

    हम दिल्ली विवि में पढ़ते थे, कुछ मित्र और भाई साहब JNU में थे.... अक्सर JNU जाना होता था, शनिवार और रविवार लगभग वहीँ JNU में ही बीतता था.... उस जमाने में JNU में किसी कोने में भी गैर कम्युनिस्ट विचारधारा का कोई नामलेवा नहीं हुआ करता था.... जो थे भी वो AISA/SFI की भीड़ के आगे दीखते नहीं हैं.... हम...

  • ये ढोल पीटने का समय नहीं है : यह भारत-पाक की असली जंग ही है...

    देश मे रह रहे करोड़ों लोग और कश्मीर घाटी के अधिकांश लोग इस 71 साल से चल रही जंग में पाकिस्तान के साथ खड़े हैं... उनकी मनःस्थिति स्पष्ट है कि हिन्दुयुक्त भारत उनका दुश्मन है.. जिसको गज़वा ए हिन्द के तहत युद्ध के इस अंतिम चरण में खत्म कर दिया जाना है... इस खूनी शतरंज में एक तरफ युद्ध विशेषज्ञ... अंतहीन...

  • सिया के राम

    न्यायप्रिय लक्ष्मण से लेकर दुःखी मिथिलावासियों तक और वर्तमान के 'यौन विकृत वामपंथी नारीवादियों' से लेकर सह्रदय संवेदनशील नारीवादियों तक के लिये राम बड़ी परेशानी का विषय रहे हैं। एक ओर उनकी सत्यनिष्ठा, वीरता, सच्चरित्रता तो दूसरी ओर शूर्पणखा के नाक-कान काटना और सबसे बढ़कर अपनी गर्भवती पत्नी का...

  • पर्यावरण संरक्षण: बड़े काम के हमारे मिथक

    एक प्रिंसटन स्कॉलर और सैनिक रॉय स्क्रेनतों ने अपने निबंध, 'लर्निंग हाऊ टू डाई इन द एनथ्रोपोसिन'2013, में लिख डाला कि 'यह सभ्यता मृत हो चुकी है' और इस बात पर जोर दिया कि आगे बढ़ने का एक रास्ता यह जान लेना भी है कि अब कुछ भी नहीं बचा जिससे हम ख़ुद को बचा सकते हों। इसलिए हमें बिना किसी मोह या डर के...

  • हिन्दी दिवस का औचित्य?

    भाषाई-दिवस मनाने की परम्परा किसी और देश में नहीं पनपी क्योंकि वहाँ भाषा पर सवाल नहीं उठते।भाषा को लेकर विवाद और आंदोलन नहीं हुआ करते।अब इस देश में आंदोलन की परम्परा रही है-भाषा, धर्म, क्षेत्र सब को लेकर, तो यहाँ दिवस भी मनाए जाते हैं। देश में कोई राष्ट्र-भाषा है नहीं, हो भी नहीं सकती, संविधान की...

  • NOTA : विषहीन सर्प / खाली कारतूस

    नोटा -(NOTA) - NONE OF THE AVOBE आजकल एक शब्द आप सबके सामने बार-बार आ रहा होगा ये शब्द है 'नोटा', दरसअल बात सब इस पर कर रहे हैं लेकिन अपने-अपने लिहाज से, मुझसे कई दिनों से इस पर लिखने के लिए कई मित्रों ने इनबॉक्स किया और मेरी नोटा के संदर्भ में राय जानने की कोशिश की, मुझसे यदि नोटा को एक लाइन...

  • क्षेत्रीयता के झगड़ों के बीच

    आज जबकि हम हिन्दू हर प्रकार से सक्षम होते हुए भी अपने भाग्य-सूर्य को अस्तालाचलगामी होते हुए देखने को अभिशप्त हैं तो ऐसे में यह प्रश्न आज पुनः विचारणीय हो गया है कि 'दुनिया ने आजतक हमें किस रूप में देखा, जाना और माना है'। इसका उत्तर एक ही है कि दुनिया ने हमें सिर्फ और सिर्फ भारतीय और हिन्दू रूप में...

  • मो मन गिरिधर छवि पे अटक्यो

    भारत अपने अधोपतन के कालखंड से गुजर रहा था। अकबर द्वारा मुगलिया सल्तनत के पाये भारत की जमीन में गाड़े जा चुके थे। दासता के साथ साथ हिंदुओं में मुस्लिम कुसंग से विलासिता व व्यभिचार भी पनप रहा था। इस विदेशी सत्ता का प्रतिरोध राजनैतिक रूप से मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश के नेतृत्व में और सांस्कृतिक रूप से...

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