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कविता

  • तुम जमीर को बेच दिए, केवल बिजली-पानी पर

    भारत माता सिसक रही हैं, तुम सब की नादानी पर, तुम जमीर को बेच दिए, केवल बिजली-पानी पर ।। तुम बोले मंदिर बनवाओ, 'उसने' काँटा साफ किया, और तीन सौ सत्तर धारा वाला स्विच भी ऑफ किया, इच्छा यही तुम्हारी थी, घुसपैठी भागें भारत से, लाकर के कानून हौंसला घुसपैठी का हाफ किया। राणा-वीर शिवा के वंशज, रीझे कु...

  • मैं नंदी : अंतहीन प्रतीक्षा का प्रतीक

    मैं नंदी प्रतीक्षा का प्रतीक हूँ अनंतकाल से ही, भक्ति - प्रतीक्षा का आदर्श रूप जो है। अंतहीन प्रतीक्षा ही तो है - यह जीवन। जो होना है, उसके हो लेने में समय है अभी जिसकी ख़ातिर जिए जा रहे हैं, बीते जा रहे हैं हम बहे जा रहे हैं, समय के साथ नदी की तरह। नदी की प्रतीक्षा समुद्र तक की समुद्र की...

  • मैं राम हूँ: मैं निर्वासित था अयोध्या से

    मैं राम हूँ - मैं निर्वासित था अयोध्या से मैं राम हूँ - मैं निर्वासित हूँ आज भी अयोध्या से। मैं राम - निर्वासित रहा सीता की उलाहनाओं से भी निःशब्द, राजमहल से निकलती सीता ने नहीं किया मुझसे कोई भी प्रश्न। सीता- निर्वासित किया जिसने अपने प्रति मेरे कर्तव्यों से। मैं राम - निर्वासित...

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