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धर्म परिवर्तन के लहू पर ज़िंदा मज़हबी गिद्ध

धर्म परिवर्तन के लहू पर ज़िंदा मज़हबी गिद्ध

गिद्ध और शैतान

कई दिनों से सोचा कि लिखा जाए या नहीं? या लिखूं तो क्या लिखूं? कोई क्या समझेगा? मगर मन में एक क्षोभ था, एक आक्रोश था, एक गुस्सा था. शायद पहली बार ऐसा हुआ जब किसी की मृत्यु ने मन में गुस्सा भरा! आखिर ऐसा क्या था अंडमान और निकोबार के उस द्वीप में जो चाऊ वहां पर गया, और एक बार नहीं बार बार गया! इस बार वाटरप्रूफ बाइबिल लेकर गया. और उसने अंतिम सन्देश में लिखा था Lord, is this island Satan's last stronghold where none have heard or even had the chance to hear your name?" अर्थात वह उस द्वीप के लोगों को शैतान का आख़िरी गढ़ समझता था क्या? इस हत्या के उपरान्त हर स्थान पर मिली जुली प्रतिक्रिया है. कुछ लोग आदिवासियों को दोषी ठहरा रहे हैं तो कुछ लोग स्थानीय प्रशासन को. मगर यहाँ पर देखना होगा कि वाकई में दोषी कौन है? क्या वाकई में स्थानीय प्रशासन या आदिवासी इस दुखद घटना के लिए उत्तरदायी हैं?

जरा दिल पर हाथ रखकर सोचिये, ईसाई धर्म प्रचारक चाऊ की मृत्यु के लिए इन दोनों में से कोई भी उत्तरदायी नहीं है, यदि कोई दोषी है तो वह है रिलिजन की विस्तारवादी भावना. ईसाई पंथ का वह विश्वास जिसमें उनके रिलिजन के अतिरिक्त हर कोई शैतान है, जिस तरह इस्लाम में उनके मज़हब के अलावा सभी काफ़िर हैं और हर काफिर को इस्लाम के झंडे तले लाने के लिए कभी आईएसआईएस तो कभी कुछ और संगठन अपना सिर उठाकर पूरी धरती को इस्लाम के रंग में रंगना चाहते हैं, उसी तरह ईसाई रिलिजन के लोग भी ईसा के रिलिजन के तले सबको लाना चाहते हैं. फिर चाहे उस स्थान या उन लोगों की अपनी पहचान ही नष्ट क्यों न हो जाए. बस किसी तरह से हम उन्हें अपने मज़हब में ले आएं, बस किसी तरह से हम उन्हें अपने रिलिजन का हिस्सा बना लें.

लार्ड शैतान का यह टापू आखिर आपकी शिक्षाओं से अछूता क्यों है? अफ्रीका की कई प्रजातियों की पहचान नष्ट करने के बाद, पूरे पूर्वोत्तर की पहचान नष्ट करने के बाद, पूरे विश्व को अपने विस्तारवादी रिलिजन के कारण एक बार नहीं कई बार परेशानियों में डालने के बाद भी ईसाई मिशनरी अपने रिलिजन के विस्तार में दिलो जान से लगी रहती हैं. प्रश्न यह उठता है कि भोले भाले आदिवासियों को शैतान कहने का अधिकार उस ईसाई रिलिजन के प्रचारक को किसने दिया? आखिर दया का एक मोल क्यों होता है? और क्यों होना चाहिए? क्या जो लोग उस रिलिजन का हिस्सा नहीं है वह सब शैतान हैं? यदि नहीं तो उन आदिवासियों को शैतान कहकर पूरी की पूरी पहचान को अपमानित करने का अधिकार ईसाइयों को आखिर किसने दे दिया?

भगवान के लिए, आदिवासियों को उनकी अपनी दुर्लभ पहचान के साथ जीने दीजिये, वह बाहरी दुनिया के साथ यदि नहीं आना चाहते, वैसे यह भी भ्रम है क्योंकि सेंटिनल द्वीप पर सेंटिनल प्रजाती के लोग अपनी शर्तों पर बाहरी दुनिया से संपर्क रखते भी हैं. वह यहाँ पर लगभग पचास से साथ हज़ार सालों से रह रहे हैं. एक दो बार कुछ लोगों ने यहाँ जाने का प्रयास किया तो उन्हें भी अपनी जान से हाथ धोना पड़ा. दो मछुआरों की ह्त्या के उपरान्त हमारे देश की सरकार ने आदिवासियों की सभ्यता को बचाए रखने के लिए यह कड़ा नियम बनाया कि कोई भी बाहरी व्यक्ति यहाँ नहीं जाएगा.

मगर कथित रूप से सभ्य बनाने और अपने रिलिजन के अतिरिक्त किसी और रिलिजन को पवित्र न समझने की सनक ने न केवल चाऊ को सरकार के द्वारा बनाए गए नियम तोड़ने के लिए प्रेरित किया बल्कि उसमें इस हद तक जूनून था कि उसे अपनी जान जाने का कोई गम भी नहीं था. अपने रिलिजन का प्रचार करने का भूत इस हद तक चाऊ पर सवार था कि उसने हर नियम और कायदे को तोडकर और रिश्वत देकर उस द्वीप पर जाने का फैसला किया.

इस न को समझिये, उन्हें जीसस के द्वारा पवित्र जल नहीं चाहिए, उन्हें उनका ही जल चाहिए, उन्हें उनकी पहचान चाहिए, उन्हें उनकी निजता चाहिए. हर पुस्तक मेले में फ्री में बाइबिल बांटने वाले प्रचारक शायद शहर और आदिवासियों का फर्क नहीं कर सके. जबरन हाथ में बाइबिल थमाने से आपके रिलिजन का प्रचार नहीं हो रहा है, इसे समझिये. और इसे अब समझना बहुत आवश्यक है कि सभी को उनकी अपनी पहचान के साथ जीने दीजिये, और भोले भाले आदिवासियों को शैतान का कोना न कहें.

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