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बंगाल की कलंक-कथा

बंगाल में पिछले दिनों जो हुआ, उस पर किसको अचरज है?

केवल उन्हीं को, जो इतिहास से अनजान हैं।

क्योंकि तथ्यक तो यही है कि बंगाल अगर जल रहा है तो कौन-सी नई बात है? बंगाल से ही तो इस पूरे फ़साद की शुरुआत हुई थी!

बंगाल ही तो मुस्लिम लीग का गढ़ था ! बंगाल से ही तो बंटवारे की विषबेल पनपी थी! सांस्कृीतिक पुनर्जागरण की यह भूमि ही तो मज़हबी बंटवारे की उपजाऊ धरती साबित हुई थी!

जाने क्या वजह है कि हम पाकिस्तान के बारे में जितनी बात करते हैं, उतनी बंगाल के बारे में नहीं करते! पूर्वबंग, जो आज बांग्लादेश है, का बंटवारा भी पाकिस्तान के साथ ही हुआ था, लेकिन हम पूर्वी सीमा में बढ़ रहे ख़तरे से अनजान हैं!

वर्ष 1905

जब स्वावधीनता आंदोलन अभी गति ही पकड़ रहा था

जब गांधी अभी दक्षिण अफ्रीका में ही थे

जब कांग्रेस अभी नई-नवेली संस्थाा ही थी

जब दूसरी तो क्या पहली लड़ाई भी पूरे नौ साल दूर थी

जब भारत में ब्रिटिश राज की जड़ें इतनी मज़बूत थीं कि जैसे उन्हें यहां पर और हज़ार सालों तक रहना हो!

तब यह बंगाल ही था, जो मज़हबी आधार पर टूट गया था!

1905 का "बंग-भंग !" आंदोलन

कालांतर में पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिम बंगाल की जो थ्योरी अस्तित्व में आई, उसका परीक्षण तो बंगाल 1905 में ही कर चुका था।

हिंदू बहुल बंगाल, बिहार, उड़ीसा एक तरफ़ और मुस्लिम बहुल असम और पूर्वी बंगाल दूसरी तरफ़। यह 1905 का हाल है, और आपको 2018 पर अचरज हो रहा है!

फिर आया 1911 का साल, जब ब्रिटिश राज की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली! भेज दिया गया, दिल्ली में ब्रिटिश साम्राज्यवाद का "दिल्ली दरबार" सजा। मज़हबी आधार पर 'बंग-भंग" को निरस्त किया गया और अब भाषाई आधार पर बंटवारे की बात कही गई।

असमिया, बिहारी, ओडिशी बोलने वाले एक तरफ़, बंगाली बोलने वाले दूसरी तरफ़।

हमें बचपन से यही पढ़ाया गया कि अंग्रेज़ फूट डालकर राज करते थे, यह किसी ने नहीं बताया कि बंटवारे की भावना तो हमारे भाइयों के ही दिल में सुलग रही थी!

आज कम ही लोगों को यह याद रहता है कि जिसे हम "भारत विभाजन" कहते हैं, वह तकनीकी अर्थों में संपूर्ण भारत का विभाजन नहीं था, बल्किन वह "पंजाब-विभाजन" और "बंगाल-विभाजन" अधिक था।

पंजाब को बांटकर दो भागों में तोड़ दिया गया : लाहौर वाला पंजाब उधर, अमृतसर वाला पंजाब इधर।

बंगाल को बांटकर दो भागों में तोड़ दिया गया : ढाका वाला बंगाल उधर, कलकत्ता वाला बंगाल इधर।

सिंध और बलूचिस्ताोन पाकिस्तायन को बोनस में दिए गए।

और देश के मध्यवर्ती प्रांतों में रहने वाले हमारे भाइयों ने कहा, हम तो यहीं रहेंगे!

ये बंटवारा था?

1947 में भारत की आबादी 36 करोड़ थी। 3 करोड़ भाई पाकिस्तांन गए, 3 करोड़ भाई पूर्वी पाकिस्ता न गए, साढ़े 3 करोड़ भाई यहीं पर रह गए। इसको आप बंटवारा कहते हो! दो नए मुल्कों में भाई बहुसंख्यसक हो गए, भारत नामक तथाकथि‍त सेकुलर राष्ट्र में वो सबसे बड़े अल्प्संख्यंक हो गए और संविधान निर्माण की प्रक्रिया इस सवाल पर आकर ठिठक जाती रही कि इतनी बड़ी आबादी को तुष्ट करने के लिए "कॉमन सिविल कोड" का क्या करें? इसको आप "टू नेशन थ्योरी" कहते हो!

वर्ष 1927 में मुस्लिम लीग के पास केवल 1300 सदस्य थे, एक गांव के चुनाव का परिणाम प्रभावित कर सकें इतनी भी इनकी हैसियत नहीं थी।

1944 में यह हालत थी कि अकेले बंगाल में पांच लाख से भी अधिक भाई मुस्लिम लीग के सदस्य बन चुके थे और भारत विभाजन की थ्योरी दिन-ब-‍दिन बल पकड़ती जा रही थी।

1947 में जब भारत का बंटवारा हुआ तो पूरा देश सांप्रदायिक दंगों की आग में झुलस रहा था। इन दंगों की शुरुआत कहां से हुई थी?

जवाब सरल है : आपके प्रिय बंगाल से!

16 अगस्त , 1946 यानी भारत की स्वंतंत्रता से ठीक एक साल पहले कलकत्ते में पहला दंगा भड़का और बंगाल के गांवों तक फैल गया। दंगों को मुस्लिम लीग द्वारा जानबूझकर भड़काया गया था। वह पाकिस्ताान के निर्माण के लिए अंतिम रूप से आम सहमति का निर्माण करने के लिए एक "ट्रिगर मूवमेंट" था। अंग्रेज़ भारत से बोरिया बिस्तर समेटने लगे थे और भाइयों को महसूस हुआ, अभी नहीं तो कभी नहीं। लोहा गर्म है, हथौड़ा मारो। और उन्होंने हथौड़ा मारा।

बंगाल से यह आग बिहार पहुंची, बिहार से यूनाइटेड प्रोविंस और वहां से पंजाब।

"कलकत्ते का इंतक़ाम नौआखाली में लिया गया, नौआखाली का इंतक़ाम बिहार में, बिहार का गढ़मुक्तेतश्व र में, गढ़मुक्ते श्वलर के बाद अब क्या?" ये उस वक़्त की एक सुर्ख़ी है।

15 अगस्त को जब दिल्ली में आज़ादी का जश्न‍ मनाया जा रहा था, तब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी कहां पर थे? वे बंगाल में बेलियाघाट में थे और वे वहां पर क्या कर रहे थे? वे उपवास पर थे और सांप्रदायिक दंगों को शांत करने की अपील कर रहे थे। उपवास से विषबेल को समाप्ता किया जा सकता है, "यह गांधी-चिंतन" था।

मुस्लिम लीग ने जब पाकिस्तान की मांग की थी, तो उसका तर्क क्यां था?

मुस्लिम लीग का तर्क था कि कांग्रेस "बनियों" और "ब्राह्मणों" की पार्टी है और लोकतांत्रिक संरचनाओं में मुसलमानों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं दिया जा रहा है।

लेकिन जब पाकिस्तान बना तो क्या वहां पर वे लोकतांत्रिक संरचनाएं निर्मित हुईं?

भारत में पहला लोकतांत्रिक चुनाव 1952 में हुआ था, जिसमें कांग्रेस को जीत मिली थी। पाकिस्तान में पहला लोकतांत्रिक चुनाव इसके पूरे 18 साल बाद 1970 में हुआ! ये रही आपकी लोकतांत्रिक संरचना!

और जब उस चुनाव में पूर्वी पाकिस्तानन के शेख़ मुजीबुल्ला को भारी जीत मिली तो पाकिस्तान में गृहयुद्ध छिड़ गया और ढाका में भीषण नरसंहार की शुरुआत हुई, जिसके गुनहगारों का फ़ैसला आज तक बांग्ला देश में किया जाता है।

इसके लिए देश को तोड़ा गया था?

1946 में भाइयों को यह साफ़-साफ़ बोलने में शर्म आ रही थी कि हमें अपने लिए एक कट्टरपंथी सैन्य वादी आतंकवादी मुल्क़े चाहिए!

अब उन्हें कश्मीर भी चाहिए!


अभी मैं यहां पर 1971 के बाद निर्मित हुई परिस्थिकतियों में पश्चिमी बंगाल और असम में बांग्लादेशियों की अवैध घुसपैठ की विस्तार से बात ही नहीं कर रहा हूं, जिसका मक़सद आबादी के गणित से चुनावों में जीत हासिल करना है।

2007 में कलकत्ता

2013 में कैनिंग

2016 में धुलागढ़ और

2017 में बशीरहाट

में पहले ही "ट्रेलर" दिखाए जा चुके थे।

ख़तरा पश्चिमी और पूर्वी दोनों सीमाओं पर है, और देश के भीतर तो ख़ैर है ही!

पुनश्च-- 1300 सदस्य वाली मुस्लिम लीग ने बीस साल में देश तोड़ दिया था! आधुनिक राजनीति और लोकतंत्र संख्याबल का खेल है! जनसांख्यिकी के सांप का मुंह कुचलना अब ज़रूरी हो गया है! नहीं तो बंग-भंग को "भारत-भंग" बनने से नहीं रोका जा सकेगा! लोहे के दस्ताने पहनकर जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम जो पार्टी लागू कर सकती है, अगले सौ साल तक मेरा वोट उसी को! और मैं देखता हूँ कौन लिबरल सेकुलर इसका विरोध करता है!

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