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महाशिवरात्रि - अंतिम पार्ट

महाशिवरात्रि - अंतिम पार्टदेवाधिदेव महादेव: जिनका आदि है ना अंत

गतांक से आगे......
शिव को देखिए परस्पर विरोधी तत्वों का महानतम समुच्चय। प्रेम के लिए पार्वती को कठिन धैर्य वाली प्रतीक्षा कराते हैं फिर प्रेम में उनकी वेणियां गूंथते हैं तो कभी भील-कन्या (पार्वती की लीलारूप) के लिए सती को पीहर भेजने को राजी हो जाते हैं। कभी नंदी को पार्वती की चूड़ियों के लिए बेचने की बात पर क्रोधित हो उठते हैं। कभी आवेश में कामदेव को भस्म कर डालते हैं तो कभी मोहिनी रूपधारी विष्णु पर मोहित हो जाते हैं। कभी राम की परीक्षा के लिए सती का त्याग कर देते हैं "एहि तन सती भेंट अब नाहीं" तो सती के विरह में जार जार रोते आकाश को भयाक्रांत कर देते हैं। भक्तों के लिए सौम्य भोले हैं तो दुष्टों के लिए महाकाल। अपने लिए ढंग की कुटिया तक नहीं और रावण जैसों तक के लिए सुवर्णमयी लंका। देवाधिदेव होते हुए भी अपने आराध्य के लिए कभी वानर, कभी मदारी, कभी हस्तरेखा विशेषज्ञ के रूप धरते हैं।
🚩रहस्यदर्शी तो यहाँ तक कहते हैं कि कृष्ण अवतार में महाकाली ऊर्जा रूप में कृष्ण के तन में स्थित हुई और रूद्र, राधा के शरीर स्थापित हो गए। और दोनों ने तांडव के नए संस्करण महारास की स्थापना की।
यही कारण था कि कृष्ण का विवाह श्री राधा से नहीं हुआ क्योकि वो रूद्र रूपा शिव थे। लक्ष्मी ने रुक्मणी रूप में में अवतार लिया और कृष्ण से विवाह किया। कृष्ण-राधा वास्तव में हरी-हर रूप हैं। जहां राधा-कृष्ण की पूजा होती है वहां शिव शिव, काली और विष्णु पूजा स्वतः ही हो जाती है। श्री राधा वास्तव में रूद्र रूपा हैं और अपने अष्ट भैरव को अष्ट सखी रूप में अपनी सेवा में रखती हैं।
🚩वार्नर हाईजेनबर्ग अपने सहयोगियों के साथ पदार्थ के सूक्ष्म कणों की प्रकृति पर शोध कार्य कर रहे थे। पदार्थ का सबसे छोटा कण अणु या परमाणु हैं, यह मिथक तो पहले ही टूट चूका था। अब तो इलेक्ट्रान, प्रोटान तथा न्युट्रान से भी आगे की खोज हो चुकी थी। वाइज़न, मीसान, टेकसान तथा और भी इन छोटे-छोटे कणों के २० साथी तथा क्वार्क और उनके भी सहचर खोजे जाने के बावजूद अभी तक यह अनिश्चित ही है की पदार्थ का सबसे छोटा कण आखिर क्या है, अथवा वह है भी या नहीं।
एक समय उन्हें ऐसा लगा कि पदार्थ के सूक्ष्म कणों की वास्तविकता तो ऊर्जा (Energy) की तरंग मात्र है।
हाइजेनबर्ग अपने कुछ सहयोगियों के साथ भारत महाकवि रविन्द्र नाथ टैगोर के आश्रम शांति निकेतन आये और अपने अनुसन्धान के बारे में विस्तार से बताया और निराशा भरे शब्दों में बोले - " पदार्थ के सबसे छोटे कण की खोज करते करते अब तो ऐसा अनुभव होता है कि पदार्थ की कल्पना ही झूठ है। तब फिर सच क्या है? उत्तर में विश्व कवि ने अद्वैत वेदांत के महान आचार्य आदि गुरु शंकराचार्य के ग्रन्थ "विवेक चूड़ामणि" का निम्न श्लोक उच्चारित किया -
"यदिदम सकलं विश्वं नाना रूपम् प्रतीतमज्ञानत । ततसर्वम् ब्रह्मैव प्रत्स्यताशेष भावनादोषम ।।" अर्थात यह सम्पूर्ण विश्व, जो अज्ञान से नानारूप व् नाना नाम वाला प्रतीत होता है, वास्तव में वह समस्त भावनाओं के दोषों से रहित ब्रह्म ही है।
🚩आधुनिक क्वांटम सिद्धांत पर नटराज की तुलना वैज्ञानिक Fritzof Capra की नजर से देखिए... 1975 में Tao of Physics नामक पुस्तक लिखी इन्होंने... उनके मुताबिक आधुनिक भौतिकी में पदार्थ निष्क्रिय और जड़ नहीं है। शिव जी का ताण्डव नृत्य ब्रह्माण्ड में हो रहे मूल कणों के नृत्य का प्रतीक है...। लिहाजा कोई आश्चर्य नहीं नाभिकीय अनुसंधान यूरोपीय संगठन (सीईआरएन) में नटराज की प्रतिमा की स्थापना की गयी
🚩ब्रह्म की संकल्पना के लय क्रम में शिव तत्व के दर्शन किए जाएं तो... शिखर पर चन्द्रमा शिव तत्व वह तत्व है जो कि मन के परे है। चंद्रमा मनसो जातः। अव्यक्त को व्यक्त करने के लिये शिव के शिखर पर यह पतला सा चन्द्रमा है जो कि मन का द्योतक है। ब्रह्मज्ञान मन के परे है, परन्तु उसे व्यक्त करने के लिये थोड़े मानस की आवश्यकता है- यही चंद्रशेखर का प्रतीक है।
🚩डमरू इस ब्रह्माण्ड का प्रतीक है। एंट्रापी के सिद्धांत के अनुसार, ब्रह्माण्ड सदैव फैल रहा है और विलीन हो रहा है। वह फैलता है, विलीन हो जाता है और फिर पुन: उसका विस्तार होता है, यही सृष्टि का नियम है।
यदि आप अपने दिल की धड़कन को देखें तो पायेंगे कि वह केवल एक सीधी रेखा में नहीं चलती, उसकी एक लय है जो ऊपर नीचे होती है। डमरू के आकार को देखो-पहले चौड़ा फैला हुआ है, फिर वह पतला हो जाता है और पुन: चौड़ा हो जाता है। डमरू ध्वनि का भी प्रतीक है। ध्वनि लय है, ध्वनि ऊर्जा भी है। यह पूरा ब्रह्मांड केवल तरंगों का पुंज है- उसमें केवल अलग-अलग कंपन है। प्रमात्र भौतिकी (क्वांटम फिजिक्स) भी यही कहती है- पूरा ब्रह्मांड तरंगों के अलावा कुछ और नहीं है। वह केवल एक ही तरंग है (अद्वैत) है। यानि डमरू ब्रह्मांड की अद्वैत प्रकृति का प्रतीक है।
🚩गले में सर्प समाधि की अवस्था है- जहाँ कुछ भी नहीं होता- केवल चिदाकाश होता है- वही शिव है।
🚩त्रिशूल चेतना के तीन पहलुओं का प्रतिनिधित्व करता है- जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति, और यह तीन गुणों का भी प्रतीक है- सत्व, रजस और तमस। शिव द्वारा त्रिशूल धारण करना इसी का प्रतीक है कि शिव (दिव्यता) तीनों अवस्थाओं- जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति के परे हैं, और फिर भी वह तीनों को धारण किये हुए हैं। शूल मायने समस्याएँ या दु:ख। त्रिशूल का अर्थ है- वह जो सभी पीड़ाओं का अंत करे।
🚩सिर से गंगा की धारा ज्ञान है वह ज्ञान जो कि आपकी आत्मा को शुद्ध करे। मस्तक हमेशा ज्ञान का प्रतीक रहा है। दिल प्रेम का प्रतीक है। यदि गंगा का अर्थ प्रेम होता तो वह भगवान शिव के दिल से बाहर निकलती हुई चित्रित करी जातीं। वह मस्तक से निकल रही हैं क्योंकि इसका अर्थ केवल ज्ञान है। ज्ञान मुक्ति देता है, ज्ञान स्वतंत्रता लाता है, ज्ञान शुद्ध करता है।
🚩नंदी (बैल)- भगवान शिव के वाहन दुनिया भर में बहुत समय से बैल को धर्म का एक प्रतीक माना गया है। बैल पर सवार होकर भगवान शिव के चलने का यही तात्पर्य है कि जब आप धर्म और सत्य की राह पर चलते हैं तो दिव्य अनंत चेतना और भोलेभाव वाली चेतना आपके साथ रहती है।
🚩तांडव सारी सृष्टि एक ही चेतना (शिव) का नृत्य है। एक चेतना ने नृत्य किया और सृष्टि के लाखों प्रजातियों में प्रकट हो गयी। इसलिए यह अनंत सृष्टि भगवान शिव का नृत्य है या शिव तांडव है। पूरी सृष्टि ही शिव का निवास है।
🚩कैलाश- शिव का निवास कैलाश पर्वत पर है और शमशान में है। कैलाश का अर्थ है जहाँ केवल उल्लास हो, और शमशान यानि जहाँ केवल शून्य हो। दिव्यता शून्य में पायी जाती है या तो किसी उत्सव में। और तुम्हारे भीतर शून्य भी है और उत्सव भी है।

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