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सत्यानासी (भाग -1)

सत्यानासी (भाग -1)भारत के विकास में वामपंथियों का योगदान ऐसा है जैसे "फसल के विकास में सत्यानासी"

मैंने बचपन में यह नाम नहीं सुना था। भारतीय कृषि और वानिकी को चौपट करके खाद्यान्न के मामले में परनिर्भर बनाने के कुछ विश्वासघाती उपक्रम किसी देश द्वारा किए गए। इसी का परिणाम था कुछ वनस्पतियों का बहुत कम समय में भारत के सुदूर कोनों में फैल जाना। इनका नामकरण यदि पारिभाषिक शब्दावली तैयार करने वाली संस्था ने किया होता तो इनका अर्थ जानने के लिए मूल भाषा के नाम या उसके अंग्रेजी अनुवाद को जानने की विवशता होती फिर भी, उसे देखकर भी, उसके गुण-दोष का पता न चलता। पर हुआ यह कि ये वनस्पतियां हिन्दी निदेशालय की आंख में धूल डाल कर सीधे गांव देहात तक फैल गईं। नामकरण उनको करना पड़ा जो धातु-उपसर्ग-प्रत्यय की समझ नहीं रखते, परन्तु भाषा की आत्मा की परख रखते हैं।
एक को उन्होंने नाम दिया "गाजर घास", क्योंकि इसकी पत्तियां गाजर की पत्ती जैसी होती हैं, दूसरे को नाम दिया "बेहया"। ऐसा निर्लज्ज पौधा जिसे काट दो, सुखा दो, फिर भी कहीं से थोड़ी सी भी नमी मिल गई तो हरा ही नहीं हो जाता, इतनी तेजी से फैलता, और बढ़ता है कि इससे निपटना मुश्किल हो जाता है। तीसरे के लिए किसी ने नाम चुना सत्यानासी(शी)। मुझे इसकी शक्ल की सही याद नहीं, पर शायद यह दक्षिणी अमेरिका के वर्षा वनों का वह परजीवी पौधा है जो बड़े से बड़े पेड़ से चिपक कर उसके रस का दोहन करता हुआ लहलहाता रहे और उसे सुखा दे पर एक बार चिपक जाने के बाद उसे काट कर अलग नहीं किया जा सकता।
भारतीय राजनीति में कम्युनिज्म का प्रवेश भी सत्यानासी की तरह ही हुआ। इसने जिस-जिस का स्पर्श किया उसका सत्यानाश करके रख दिया, यह मेरा मोटा अनुमान है क्योंकि इसने अपने आन्दोलनों के माध्यम से निकम्मेपन को महिमा मंडित करके कामचोरी को, फिर काम कराने के लिए रिश्वतखोरी को बढ़ावा दिया और मिलावट को विचार के स्तर से लेकर वस्तु के स्तर पर प्रोत्साहित किया, गो इनमें से कोई घोषित रूप मे उसकी कार्ययोजना का अंग नहीं था, न ही यह कहा जा सकता है कि कम्युनिस्ट आन्दोलन से समाज के सबसे भ्रष्ट लोग आकर्षित हुए थे।
सत्ता से सहयोग के कुछ विरल मौकों को छोड़ दें तो कम्युनिस्ट होना नैतिक विवेक और मानवीय संवेदनशीलता ही नहीं बौद्धिक प्रखरता का भी सूचक था जिसमें अपने लिए कुछ पाने का नहीं, अपितु एक आदर्श सामाजिक आर्थिक भविष्य के लिए अपने हितों और जीवन तक को न्यौछावर करने की आकांक्षा ही बलवती हुआ करती थी और इसी के कारण कम्युनिस्ट पार्टी का कार्डधारक अपने को गौरवान्वित और किसी कारण इससे वंचित किए जाने को अपमानजनक समझता था और कई बार इस सम्मान को बचाने के लिए अपमानजनक शर्तें मानने तक को तैयार हो जाता था।
चूक कहां हुई कि परिणाम इरादे के विपरीत होते चले गए, यह शोध का विषय हो सकता है जो विचार और अभिव्यक्ति के अभाव में संभव नहीं और जिसकी छूट गुप्त गतिविधियों और हिंसक तरीकों को अपनाने वाला कोई संगठन तो दे ही नहीं सकता अपने सभी सदस्यों को अंपनी अतरंग गतिविधियों और योजनाओं को जानने का अधिकार तक नहीं दे सकता। लक्ष्य पवित्र हो तो उसे प्राप्त करने के लिए अपवित्र या गर्हित तरीका अपनाया जा सकता है, यह तो हिंसा का रास्ता चुनने में ही अंतर्निहित है। शोषण परोक्ष हिंसा है, और युगों से चली आ रही इस हिंसा को समाप्त करने के लिए किसी पैमाने पर हिंसा की जा सकती है। यह हिंसा होते हुए भी हिंसा नहीं, हिंसा का खात्मा है। विरोधों की निकटता का सिद्धान्त - वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति। कम्युनिस्ट हिंसा हिंसा न भवति! असुर की पहचान बदल जाती हैं, असुर संहार जारी रहता है ।
हिंसा की आदत पड़ जाने पर नए बहाने तलाश लिए जाते हैं हिंसा को उचित ठहराने के। ऐसा न होता तो क्रान्ति के योद्धाओं को उनके ही साथियों ने न मारा होता। देवासुर संग्राम के कई दौरों के बाद प्राचीन भारत ने अहिंसा का मूल्य समझा था। हिंसा से मुक्त कोई दौर था यह दावा नहीं कर सकता, पर एक मूल्य के रूप अहिंसा भारतीय चेतना में इतनी गहराई तक उतर गई कि नरहत्या का प्रायश्चित ही नहीं उपयोगी जीवों - कुत्ता, बिल्ली, गाय - की अनजाने भी मृत्यु हो जाने पर अपमानजनक और यातनाप्रद प्रायश्चित से गुजरने के बाद ही व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी का जीवन बिता सकता था। यह वर्णनिरपेक्ष रूप में पूरे भारतीय समाज पर घटित होता था, और जो आखेटजीवी इस मर्यादा का पालन नहीं करते रहे हैं उन्हें चांडाल कहा जाता था।
ठीक ऐसी ही वितृष्णा छल, प्रपंच, विश्वासघात आदि के प्रति रही है। इसलिए गुप्त योजनाओं वाले संगठनों के प्रति रही है। उन्हें अपराधकर्मी माना जाता रहा है। यदि भारतीय मानस की इतनी समझ भी होती तो कम्युनिस्टों ने भारतीय संदर्भ में सही कार्यदर्शन अपनाया होता। रक्तक्रांति और गुप्त गतिविधियां पाश्चात्य मनोरचना के अनुरूप हैं जिसमें साध्य ही अंतिम कसौटी है जिसके लिए गर्हित तरीका भी अपनाया जा सकता है, जहां प्यार और युद्ध में सब कुछ जायज है, परंतु भारतीय मूल्यचेतना प्यार और युद्ध में भी मर्यादा की रक्षा न कर पानेवाला समाज की नजर में गिर जाता है।
इसलिए भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन विदेशों मे शिक्षित और पाश्चात्य शिक्षा प्राप्त होनहार नौजवानों के आकर्षण का केन्द्र भले बना हो, सामान्य अल्पशिक्षित और अशिक्षित भारतीय समाज के लिए विकर्षक ही बना रहा। जो बात भाषा के विषय में कही जाती है कि इसकी कसौटी इसका लिखित रूप या सुशिक्षित लोग नहीं, अनपढ़ और अल्पशिक्षित समाज है, ठीक यही बात जातीय मानस के विषय में भी सही है जिसकी चेतना में युगों पुराने जातीय मूल्य सर्वाधिक सुरक्षित रहते हैं, जब कि इससे ठीक उल्टी पाश्चात्य शिक्षा प्रणाली इसे छिन्न-भिन्न या नष्ट करने को अपना कार्यभार मानता है और अपने अनुरूप ढलने से बिदकते पाकर वह इसे मूर्ख और सिरफिरा मानता है।
यह कुछ वैसी ही सोच है जो मजहबी मामले में अपना सद्धर्म न अपनाने वाले के विषय में मिशनरी रखते हैं। इस रहस्य को समझने का प्रयत्न ही नहीं किया गया कि मूल्यान्तरण धर्मान्तरण से अधिक दुष्कर है और यहां जब हम मूल्यप्रणाली की बात कर रहे हैं तो अनपढ़ और अल्पशिक्षित की तरह वर्णविभाजन से परे, नगर, ग्राम्य और आटविक समग्र भारतीय समाज की बात कर रहे हैं, और जिसे हिन्दू कह कर संबोधित किया जाता रहा है वह वर्णव्यवस्था से नहीं, मूल्यव्यवस्था से जुड़ा समाज है। इसके किसी हिस्से को कम्युनिष्ट विचारधारा आकर्षित नहीं कर सकी, बल्कि विकर्षक लगती रही।
मैं नहीं जानता 'कम्युनिष्टों' के लिए 'कौमनष्ट' का प्रयोग पहले किसने किया था। इसे किसी दल के माध्यम से प्रचारित नहीं किया गया फिर भी यह प्रयोग में रहा और इसके साथ कुछ वैसा ही भाव जुड़ा रहा जो सत्यानासी के साथ जुड़ा मिलता है। हार्दिकता के इस अभाव के कारण अपने बुलंद इरादों के बाद भी इसकी भूमिका विनाशकारी अधिक रही. निर्माणकारी कम। यह भारतीय मानस में जगह न बना सका और जातीय स्वाभिमान से रिक्त पाश्चात्य शिक्षा प्राप्त अल्प पर मुखर तबके के भीतर सिमटा रहा।
शेष अगले भाग में -----------

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