संस्कृत भाषियों का देश और जोंस की महिमा

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संस्कृत भाषियों का देश और जोंस की महिमाSir William Jones a puisne judge on the Supreme Court of Judicature at Fort William in Bengal, and a scholar of ancient India

विलियम जोंस को शोध नहीं करना था। उनके सामने सब कुछ तय था। न होता तो उन भाषाओं को जिनके विषय में उन्हें कुछ पता न था, एक ही आदि भाषा से व्युत्पन्न न मान लेते। उदाहरण के लिए चीनी और अरबी।
यदि हम उनके सभी व्याख्यानों को ध्यान से पढ़ें तो पाएंगे कि उनको यूरोप मे अपने पदों पर काम करते हुए फारसी का कुछ ज्ञान भले रहा हो, न अरबी का ज्ञान था, न तुर्की का न चीनी का, न अवेस्ता का। संस्कृत उन्होंने कलकत्ता पहुंचने के बाद सीखी पर काम संस्कृत के पंडितों की सहायता से ही करते रहे। वह कोशों से, शब्दावलियों से, किसी जानकार व्यक्ति से कुछ आंकड़े जुटाते हैं, उनमें से अपने उपयोग के कुछ नमूने छांटते हैं और उन्हें खींच तान कर अपने मन्तव्य के समर्थन के लिए प्रमाण बना लेते हैं। उदाहरण के लिए अवेस्ता विषयक उनका ज्ञान उनके परिचित एक पारसी सज्जन बहमान के माध्यम से था: … I often conversed on them with my friend Bahman; and both of us were convinced, after full consideration, that the Zend bore strong resemblance to Sanscrit, and the Pahlavi to Arabic.
---this examination gave me perfect conviction that the Pahlavi was a dialect of the Chaldaic.
उन्हें जेन्द का एक शब्दसंग्रह मिल गया था, जिस पर उनका ज्ञान आधिकारिक हो गया था:
But when I perused the Zend Glossary, I was inexpressibly surprised to find that six or seven words in ten were pure Sanscrit, and even some of their inflexions fromed by rules of vyākaran… that the language of was al least a dialect of Sanscrit, approaching perhaps as nearly to it as Prācrit, or other popular idioms that we know to have been spoken in India two thousand years ago. From all these facts it is a necessary consequence that the oldest discoverable languages of Persia were Chāldaic and Sanscrit, and when they ceased to be vernacular, the Pahlavi and Zend were deduced from them respectively, and the Pārsi either from Zend or immediately from the dialect of the Brahmans...
अरबी और चीनी के मामले में उनकी खींचतान पराकाष्ठा पर और अवेस्ता के मामले में काम चलाऊ लगती है। चीन के विषय मे जानकारी एक पादरी के माध्यम से मिली थी। चीनी भाषा के संस्कृत से साम्य रखने का एक आधार तो यही था कि "मनु ने कहा है पतित क्षत्रिय ही हूण, यवन, सक, चीनी आदि बन गए":
Believe, by Menu, the son of Brahma, we find the following curious passage: "Many families of the military class, having gradually abandoned the ordinances of the Veda, and the company of Brahmens, lived in a state of degradation, as the people of Pundraca and Odra, those of Dravira and Camboja, the Yavanas and Sacas, the pāradas and the Pahlavas, the Chinas and some other nations"
इसी तरह की नितान्त कामचलाऊ जानकारी और उस पर आधारित कयासबाजी के आधार पर वह ईरान को ब्राह्मणों की और उनकी भाषा संस्कृत की मूलभूमि ठहराते हैं। ईरान उनकी नजर में क्या हैः
The most celebrated and most beautiful countries in the world है।… Thus we look on Iran as the noblest island (for so the Greeks and Arabs would have called it) or at least the noblest peninsula on this habitable globe…
ईरान में संस्कृत बोली जाती थी इसका विश्वास दिलाते हुए वह लिखते हैं:
I can assure you with confidence, that hundreds of Parsi nouns are pure Sanscrit, with no other change than such as may be observed in the numerous bhashas, or vernacular dialects of India; that very many Persian imperatives are the roots of Sanscrit verbs; and that even the moods and tense of the Persian verb substantive, which is the model of the rest, are deducible from Sanscrit by an easy and clear analogy; we may hence conclude, that Pahlavi was derived, like tvarious Indian dialects, from the language of the Brahmans; and I must add, that in pure Persian, I find no trace of any Arabian tongue…
वह फारस में इतिहास की भोर फूटती पाते हैं। अब उन्हें तय करना है कि भारतीय, अरब और तातार, अन्यत्र से ईरान में आ बसे थे या ईरान से निकल कर उन क्षेत्रों में पहुंचे थे। वह बताते हैं कि ईरान इन सबके बीच में है, इसलिए फारस को छोड़ कर दूसरा कोई क्षेत्र नहीं हो सकता था जहां से ये सभी निकल सकते थे। दूसरे ब्राह्मणों के प्राचीनतम धर्मग्रन्थ मे अपने देश से बाहर निकलने की साफ मनाही है इसलिए वे भारत से निकल कर ईरान आ ही नहीं सकते थे। मुहम्मद से पहले अरबों के फारस में प्रवेश करने की कोई कथा तक नहीं है। तातारों के मामले में मीदों से पहले ईरान में घुसने की कोई पुराकथा नहीं है, इसलिए यह सिद्ध हो गया कि इन तीनों नस्लों के लोग ईरान से अपने अपने देशों में पहुंचे थे और फिर वह यूरोप के बाशिन्दों को वहां से निकल कर यूरोप में आ बसने की परंपराओं को जुटाते है।
We discover therefore in Persia, at the earliest dawn of history, the three distinct races of men whom we described on former occasions, as possessors of India, Arabia, Tartary; and whether they were collected in Iran from distant regions or diverged from it as from a common centre, we shall easily determine by following considerations. Let us observe in the first place, the central position of Iran, which is bounded by Arabia, by Tartary, and by India; …no country, therefore, but Persia seem likely to have sent forth its colonies to all the kingdoms of Asia. The Brahmans could never have migrated from India to Iran, because they are expressly forbidden by their oldest existing laws to leave the region which they inhabit at this day; the Arabs have not even a tradition of an emigration into Persia before Mohammad, nor had they indeed any inducement to quit their beautiful and extensive domains; and as to the Tartars, we have no trace in history of their departure from their plains and forests till the invasion of the Medes, who, according to etymologists, were the sons of Madai; …The three races, therefore, migrated from Iran as from their common country; and thus Saxon Chronicle, I presume from good authority, brings the first inhabitants of Britain from Armenia; while a late very learned write concludes, after all his laborious researches, that the Goths or Scythians came from Persia; and another contends with great force, that both the Irish and old Britons proceeded severally from the borders of the Caspian; a coincidence of conclusions from different media by persons wholly unconnected, which could scarce have happened if they were not grounded on solid principles. We may therefore hold this position firmly established , that Iran, or Persia in its largest sense, was the true centre of population, of knowledge, of languages and of arts; which instead of travelling westward only, as it has been fancifully supposed, or eastward, as might with equal reason have been asserted, were expanded in all directions to all regions of the world in which the Hindu race had settled under various denominations…
यूरोप के गोरों को काले बंगालियों की सन्तान होने के कलंक से मुक्ति मिल गई। कंपनी को किसी सुदूर अतीत मे अपने वर्तमान रियाया की रियाया होने की कसक से मुक्ति मिल गई। एकहि साधे सब सधे, समस्या से मुक्ति पाने के लिए उसे जड़ से उखाड़ दो। सर विलियम जोन्स ने यही महान काम किया था जिसके लिए उनको तुलनात्मक भाषाविज्ञान का जनक बना दिया गया।
विलियम जोन्स अकूत जिज्ञासा से भरे, संवेदनशील, कवि मनस्क व्यक्ति थे। एक व्यक्ति के रूप में उनके लिए मेरे मन में उससे कहीं अधिक आदर है जितना मैक्समुलर के लिए। उन्होंने संस्कृत की जिन कृतियों का अनुवाद किया वे साहित्यिक प्रकृति की थीं और उनकी उन्होंने खुल कर सराहना की। परन्तु न तो वह भाषा वैज्ञानिक थे, न होने का दावा करते थे। संस्कृत के महत्व का उनका आकलन सही था और यह भी सही था कि संस्कृत उनमें से किसी की जननी नहीं थी। वे विविध भाषिक उपस्तरों के ऊपर फैली वैदिकयुगीन बोलचाल की भाषा थी, जिसमें दूसरी भाषाओं के भी तत्व थे। इसका अर्थ है किसी जाति या भाषाभाषी समुदाय का किसी रूप में बहुत बड़े पैमाने पर संचलन नहीं हआ था, अपितु इसकी सांस्कृतिक श्रेष्ठता का इतना भारी दबाव पड़ा था कि सभी अपनी अपनी सीमाओं में इसको आत्मसात करते हुए अपने भाग्योदय में जुट गए थे। परंतु उस चरण पर न तो ऐसी किसी उन्नत सभ्यता के प्रमाण उपलब्ध थे, न साहित्यिक साक्ष्य। जोन्स अपनी सीमाओं में अपनी समस्या का समाधान तलाश रहे थे।
अब हम केवल निम्न तथ्यों की ओर ध्यान दिलाना चाहेंगे:
1. सर विलियम जोन्स तक, जिनके ऊपर इंडोफीलिया या भारत-रति का आरोप लगता रहा है, न तो निष्पक्ष भाव से काम कर रहे थे, न भारत के हित में काम कर रहे थे।
2. यह दावा कि उन्होंने संस्कृत के महत्व को स्थापित किया, गलत है। वह संस्कृत के महत्व को क्षीण करते हुए यथासंभव यूरोप की क्लासिकी भाषाओं को संस्कृत की समकक्षता में लाने का प्रयत्न कर रहे थे। अब आगे का काम दूसरों को करना था।
3. इससे पहले भारत को पश्चिम के लोग भी सूर्योदय और ज्ञानोदय का देश मानते थे। वह इसे दरकिनार करते हुए ईरान को यह श्रेय दे रहे थे और उस परंपरा को उलट रहे थे जिसमें उनके अनुसार मध्येशिया से ले कर चीन तक के लोगों को पतित क्षत्रियों द्वारा बसा बताया गया है। ऐसी श्रुति परंपरा यदि अरबों में या तातारों में न थी तो ईरान में भी न थी। उल्टे उसकी श्रुति परंपरा के अनुसार जरद्वस्त्र (जरथुस्त्र ) या पीतांबर धारी मीदिया से वहां गए जिसे संभव है बहमान ने उन्हें सुझाया हो ।
4. जोन्स भारत प्रेमी नहीं थे, भारतद्रोही भी न थे। अच्छे पारखी थे और उस सीमा तक ईमानदार थे जिस सीमा तक किसी इतर की सराहना उनके राष्ट्रहित में बाधक न हो। ऐसी नौबत आने पर वह भारत की व्याजनिंदा कर सकते थे, उसके श्रेयस् को निश्रेयस भी बना सकते थे।
5. उनको तुलनात्मक भाषाविज्ञान का जनक बना दिया गया, पर तुलनात्मक भाषाविज्ञान विज्ञान है ही नही, वह विज्ञानाभास है, इंद्रजाल है। इस सचाई को समझने में भी लंबा समय लगा, पर इसे सही नाम देने का काम मैं कर रहा हूं और आप देख भले न पाएं, इस समय मै लिख नहीं रहा हूं, मैं कपूर तलाश कर रहा हूं उन लोगों की आरती उतारने के लिए जो इसे भाषाशास्त्र कहते गुजर गए, पर उसे सही नाम देने का दायित्व मेरे लिए छोड़ गए।
6. मैं इंद्रजाल को जाने या अनजान, विज्ञान बनाने के प्रयत्न में अपना जीवन उत्सर्ग करने वाले असख्य विद्वानों को नमन करते हुए, उन अज्ञात और असंख्य आत्माओं को भी नमन करता हूं जिन्होंने अन्य धातुओं को सोने में बदलने के लिए प्रयोग किए और जिनके प्रयोगों से रसायन कला शास्त्र बनते हुए विज्ञान बन गई। ठीक यही भाषाविज्ञान के क्षेत्र में भी हुआ। क्रमशः

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