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सुनो मीलॉर्ड! हर भारतीय है राम का वंशज

सुनो मीलॉर्ड! हर भारतीय है राम का वंशज

आदरणीय मीलॉर्ड

क्या वैटिकन में जीसस के वंशजों की तलाश हुई थी कि वैटिकन को क्रिश्चियनिटी का केंद्रबिंदु बनाया जा सके? मक्का के काबा की पवित्रता को सुनिश्चित करने से पहले क्या नबी के वंशजों को ढूँढा था धर्म ने?


हिन्दू धर्म पर सवाल संभवतः इसलिए किए जाते हैं क्योंकि हमारा धर्म आपको इतना स्पेस और सहूलियत देता है कि आप हमसे ऐसे सवाल आसानी से कर लेते हैं। हमारा समाज इतना कठोर रुढ़िवादी नहीं रहा कभी कि किसी के कुछ कहने पर हिंसक हो उठे।

आप किन वंशजों को अपने कोर्ट के कटघरे में खड़ा करना चाहते हैं? आप उन लोगों का क्या करेंगे जो 7323 वर्ष बीत जाने के बाद भी अपने पूरे शरीर पर राम नाम गुदवा लेते हैं। क्या आप यह अनुमान नहीं लगा पाते कि इतने हज़ार वर्षों के बीत जाने के बाद भी यह नाम साँसों की तरह लोगों के भीतर प्रवाहित है, फिर उस व्यक्तित्व का प्रभाव क्या रहा होगा?

वह वो युग था जब प्रकृति और पुरुष के बीच भी कोई द्वन्द नहीं था, जब पुरूष कहता था तो प्रकृति सुनती और बोलती थी, ऐसा तारतम्य था कि पेड़, पौधे, पक्षी, पर्वत, नदियाँ और समुद्र मनुष्य से बोल-सुन लेते थे, बातें मान लेते थे, ऐसा रिश्ता था कि समुद्र रास्ता दिया करते थे और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता के ख़ातिर किसी ईको-क्रिटिकल थ्योरी की आवश्यकता नहीं थी।

राम कौन थे इसका अनुमान आप और आपकी टीम नहीं लगा पाती क्योंकि आप उस आदर्शवादिता को सोच नहीं सकते जो सोने की लंका जीत लेने के बाद भी वहाँ से केवल अपनी सीता लेकर लौट आया हो। लंका की अकूत सम्पदा में से एक पत्थर तक अयोध्या नहीं लाया गया।

मीलॉर्ड, राष्ट्रवादिता का समग्र ज्ञान इस जन मानस ने राम से सीखा है।

आदर्शवादिता ऐसी कि किसी के सीमाओं को लाँघ कर जाना उचित नहीं था तो समुद्र पर पुल बाँधा गया था। मीलॉर्ड, जहाँ पश्चिम की राष्ट्रवादिता का जन्म लूट-पाट, शोषण की नींव पर टिका है, वहाँ राम ने अपने राष्ट्र की नींव ही त्याग पर रखी और अयोध्या छोड़ आम जन के बीच चले गए कि उनका समर्थन आवश्यक था कि अयोध्या बनी रहे।

आप राम की महत्ता नहीं समझ पाते क्योंकि आपने उन्हें कर्म, कृत्य में उतारने की कोशिश नहीं की कभी, क्योकि प्रमोशन, डिमोशन का चक्कर अब राम से ज़्यादा बड़ा है। जबकि सच यह है कि भारत की आम जनता को प्रोमोशन डिमोशन के नियमों से ज़्यादा राम में दिलचस्पी है क्योंकि राम के ही गुण वह अपने वंशजों में देखना चाहती है।

मीलॉर्ड, हमारे विद्वान कहते हैं कि राम सूर्य हैं और यह धरती सीता है, इनके बिना यह विश्व ही विश्व नहीं हो सकता। फिर सूरज की किरणें, उसका ताप, धरती की नमी को बताने और महसूस करने के लिए जब हमें राम के वंशजों को खोजने की आवश्यकता नहीं हुई तो आपको भी ऐसे प्रश्नों का उत्तर सूर्य पर जा कर तलाशना चाहिए।

मीलॉर्ड, तमाम साक्ष्यों और प्रमाणों के बाद भी कभी इतिहासकारों ने टाइम-फ्रेम को तलाशने की कोशिश नहीं की सिर्फ़ इसलिए क्योंकि इतिहासकार यह कहते हैं कि रिसर्च हम अपनी बनाई हाइपोथीसिस से करेंगे, आपके कहने पर हम राम की क्रोनोलोजी क्यों तलाश करें।

इस ज़मीन पर जगह-जगह, देश और विदेशों में भी राम की उपस्थिति के पर्याप्त साक्ष्य होने के बाद भी राम के अस्तित्व पर प्रश्न करना, गैर-जिम्मेदाराना और अमानवीय व्यवहार है जिसकी अनुमति यह जन-मानस आपको नहीं देता और इसे आपकी धृष्टता की तरह देखता है, जो जान बूझ कर किया गया है।

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