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श्रीमद्भागवत गीता का समयकाल

श्रीमद्भागवत गीता का समयकालश्रीमद्भागवत गीता शाश्वत एवं प्रामाणिक रूप से बुद्धकाल से बहुत पूर्वोत्तर है

श्रीमद्भागवत गीता भारतीय चिंतन के सार-तत्व को समझने का सबसे अच्छा स्रोत है। 2 पंक्तियों के कुल 700 श्लोकों की इस छोटी-सी पुस्तिका ने भारतीय मानस को सबसे अधिक प्रभावित किया है और इसे सदा ही सर्वमान्य आध्यात्मिक शास्त्र का स्थान दिया गया है।

भारत के सभी प्रमुख चिंतकों ने गीता के संदेश को किसी न किसी रूप में अपना समर्थन दिया है। उनमें से बहुतों ने गीता पर भाष्य लिखे हैं। ऐसा कोई भी भारतीय दार्शनिक, विचारक या धार्मिक नेता नहीं है जिस पर गीता का प्रभाव न पड़ा हो। पिछली एक शताब्दी में ही बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी, श्री अरविंद और डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे विचारकों और सामाजिक नेताओं ने न केवल गीता के संदेश को सराहा है अपितु उसकी अपनी-अपनी दृष्टि से व्याख्या भी की है।

उपनिषदों को श्रुति प्रस्थान, गीता को स्मृति प्रस्थान और ब्रह्मसूत्रों को न्याय प्रस्थान कहते हैं।ये तीनों मिलकर प्रस्थानत्रयी के नाम से जाने जाते हैं। इसपर अभी हाल ही में एक आक्षेप लगाया गया कि गीता अश्वघोष द्वारा रचित एक रचना की अनुलिपि है तो क्या वाकई गीता के कंटेन्ट अश्वघोष की रचना से लिये गए है आज इसका खंडन करते है -

गीता महाभारत के एक अध्याय भीष्म-पर्व का एक हिस्सा है।लेकिन गीता को हम अलग समझ लेते है जिससे उसके कालगणना में समस्या होती है क्योंकि गीता को विभिन्न समय मे अलग अलग विद्वानों ने टीका किया है । महाभारत की गीता को महाभारत के समयकाल के अनुसार आइये इसके कालखण्ड की गणना करते है -

ऐतिहासिक साक्ष्य -

यूनान के राजदूत मेगस्थनीज़ ने अपनी पुस्तक इंडिका में अपनी भारत यात्रा के समय जमुना (यमुना) के तट पर बसे मेथोरा (मथुरा) राज्य में शूरसेनियों से भेंट का वर्णन किया था। मेगस्थनीज़ ने यह बताया था कि यह शूरसेनी किसी हेराकल्स नामक देवता की पूजा करते थे और यह हेराकल्स काफी चमत्कारी पुरुष होता था तथा चन्द्रगुप्त से 36 पीढ़ी पहले था। हेराकल्स ने कई विवाह किए और कई पुत्र उत्पन्न किए, परन्तु उसके सभी पुत्र आपस में युद्ध करके मारे गये। यहाँ यह स्पष्ट है कि यह हेराकल्स श्री कृष्ण ही थे, विद्वान इन्हें हरिकृष्ण कह कर श्री कृष्ण से जोड़ते हैं क्योंकि श्री कृष्ण चन्द्रगुप्त से 38 पीढ़ी पहले थे, तो यदि एक पीढ़ी को 20-30 वर्ष दें तो 3000-5600 ईसा पूर्व श्री कृष्ण का जन्म समय निकलते ही, अतः इस आधार पर महाभारत का युद्ध 5600-3000 ईसा पूर्व के समय हुआ होगा।

संस्कृत की सबसे प्राचीन पहली शताब्दी की एमएस स्पित्जर पाण्डुलिपि में भी महाभारत के 18 पर्वों की अनुक्रमणिका दी गयी है। जिससे यह पता चलता है कि इस काल तक महाभारत 18 पर्वों के रूप में प्रसिद्ध थी। यद्यपि 100 पर्वों की अनुक्रमणिका बहुत प्राचीन काल में प्रसिद्ध रही होगी, क्योंकि वेदव्यास जी ने महाभारत की रचना सर्वप्रथम 100 पर्वों में की थी, जिसे बाद में सूत जी ने 18 पर्वों के रूप में व्यवस्थित कर ऋषियों को सुनाया था।

यूनान के पहली शताब्दी के राजदूत डियो क्ररायसोसटम यह बताते हैं की दक्षिण-भारतीयों के पास एक लाख श्लोकों का एक ग्रंथ है, जिससे यह पता चलता है कि महाभारत पहली शताब्दी में भी एक लाख श्लोकों का था। महाभारत की कहानी को ही बाद के मुख्य यूनानी ग्रंथों इलियड और ओडिसी में बार-बार अन्य रूप से दोहराया गया, जैसे धृतराष्ट्र का पुत्र मोह, कर्ण-अर्जुन प्रतिसपर्धा आदि।

महाराजा शरवन्थ के 5वीं शताब्दी के तांबे की स्लेट पर पाये गये अभिलेख में महाभारत को एक लाख श्लोकों की संहिता बताया गया है। वह अभिलेख निम्नलिखित है-

'उक्तञच महाभारते शतसाहस्त्रयां संहितायां पराशरसुतेन वेदव्यासेन व्यासेन।'

भौगोलिक साक्ष्य -

प्राचीन वैदिक सरस्वती नदी का महाभारत में कई बार वर्णन आता हैं, बलराम जी द्वारा इसके तट के समान्तर प्लक्ष पेड़ (प्लक्षप्रस्त्रवण, यमुनोत्री के पास) से प्रभास क्षेत्र (वर्तमान कच्छ का रण) तक तीर्थयात्रा का वर्णन भी महाभारत में आता है। कई भू-विज्ञानी मानते हैं कि वर्तमान सूखी हुई घग्गर-हकरा नदी ही प्राचीन वैदिक सरस्वती नदी थी, जो 5000-3000 ईसा पूर्व पूरे प्रवाह से बहती थी और लगभग 1900 ईसा पूर्व में भूगर्भी परिवर्तनों के कारण सूख गयी थी। ऋग्वेद में वर्णित प्राचीन वैदिक काल में सरस्वती नदी को नदीतमा की उपाधि दी गई थी। उनकी सभ्यता में सरस्वती नदी ही सबसे बड़ी और मुख्य नदी थी, गंगा नहीं।

भूगर्भी परिवर्तनों के कारण सरस्वती नदी का पानी गंगा में चला गया और कई विद्वान मानते हैं कि इसी कारण गंगा के पानी की महिमा हुई। इस घटना को बाद के वैदिक साहित्यों में वर्णित हस्तिनापुर के गंगा द्वारा बहाकर ले जाने से भी जोड़ा जाता है, क्योंकि पुराणों में आता है कि परीक्षित की 28 पीढ़ियों के बाद गंगा में बाढ़ आ जाने के कारण सम्पूर्ण हस्तिनापुर पानी में बह गया और बाद की पीढ़ियों ने कौशाम्बी को अपनी राजधानी बनाया। महाभारत में सरस्वती नदी के विनाश्न नामक तीर्थ पर सूखने का सन्दर्भ आता है, जिसके अनुसार मलेच्छों से द्वेष होने के कारण सरस्वती नदी ने मलेच्छ (सिंध के पास के) प्रदेशो में जाना बंद कर दिया।

विभिन्न विद्वानों के मतानुसार -

पाणिनि(700-500 ईसा पूर्व) द्वारा रचित अष्टाध्यायी महाभारत और भारत दोनों को जानती है। अतएव यह निश्चित है कि महाभारत और भारत पाणिनि के काल के बहुत पहले से ही अस्तित्व मे है।

विश्व विख्यात भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलज्ञ वराहमिहिर के अनुसार महाभारत युद्ध 2449 ईसा पूर्व हुआ था।

विश्व विख्यात भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलज्ञ आर्यभट के अनुसार महाभारत युद्ध 18 फरवरी 3102 ईसा पूर्व में हुआ था।

भारत के महान प्राचीन खगोलविद आर्यभट्ट ने महाभारत एवं भागवत में वर्णित खगोलीय सबूतों की जांच की और उसे शत प्रतिशत सही पाया, ये खगोलीय प्रेक्षण भागवत पुराण के बारहवें सर्ग के दूसरे अध्याय में समाहित रहे हैं,

अर्जुन के पौत्र राजा परीक्षित को शुकदेव जी बताते हैं! -

सप्तर्षीणां तू यू पुरवौ दर्शयते उदिता दिवि ।

तयोस्तुमध्ये नक्षत्रं दृश्यते यत समम निशि ।।27।।

तेनैता ऋषयो युक्तस्तिष्ठंत्यब्दशन्त न्रणम् ।

तय त्वदीय द्विजः काले अधुना चरसहिता मघः ।।28।।

अर्थात - जब सप्तऋषि पूर्व के आकाश में उदय होंगे, सबसे पहले, प्रथम दो नक्षत्र ही दिखायी पड़ेंगे, दो नक्षत्रों के बीच में, एक चन्द्र नक्षत्र आकाश के विपरीत और रहेगा, ये सातों नक्षत्र शत(सौ) पृथ्वी वर्षों के लिए अपने मंडलों में रहेंगे, हे परीक्षित अर्थात तुम्हारे जन्म के समय से तुम्हारी मृत्यु तक ये मघा नक्षत्र में रहेंगे!

शाकल्य सहिंता में भी यही वर्णन मिलता है, पृथ्वी का 1 वर्ष सप्तऋषि तारामंडल का 8 मिनिट होगा, 27 नक्षत्रों का एक घूर्णन लगभग 2700 सालों में पूरा होता है, इसी काल को दोगुना (तीसरे युग से कलियुग की दूरी) करने पर 3100 से 5000 वर्षो तक की गणना प्राप्त होती है!

।।इस उल्लेख पर एक बात याद आ गयी कि सर्वप्रथम भागवत पुराण में ही दो सप्तऋषि तारों से ध्रुव तारे की पहचान करने का संकेत मिलता है जिसकी खोज हम हजारों वर्ष पूर्व कर चुके हैं उसकी यही खोज हाल के वर्षो में की गई है।।

राजवंशो के समयकाल की गणनानुसार -

महाभारत मे गुप्त और मौर्य राजाओं तथा जैन(1000-700 ईसा पूर्व) और बौद्ध धर्म(700-200 ईसा पूर्व) का भी वर्णन नहीं आता। जबकि बौद्ध साहित्यो में कई जगहों पर महाभारत और उसके पात्रों का वर्णन मिलता है ।

छांदोग्य-उपनिषद (1000 ईसा पूर्व) में भी महाभारत के पात्रों का वर्णन मिलता है। अतएव यह निश्चित तौर पर 1000 ईसा पूर्व से पहले रची गयी होगी।

चालुक्य राजवंश के सबसे महान सम्राट पुलकेसि 2 के 5वीं शताब्दी के ऐहोल अभिलेख में यह बताया गया है कि भारत युद्ध को हुए 3,735 वर्ष बीत गए हैं, इस दृष्टिकोण से महाभारत का युद्ध 3100 ईसा पूर्व लड़ा गया होगा।

परीक्षित से लेकर महापद्म तक की पीढ़ियों का आकलन जो 1015, 1050, 1125 एवं 1500 वर्ष के लगभग चला आ रहा आता है। तो युधिष्ठिर संवत् का समय ईसा से 2449 वर्ष पूर्व निश्चत करते हैं यानी महाभारत का कालखण्ड यही रहा होगा।

चन्द्रगुप्त मौर्य से मिला कर देखा जाये तो 1900 ईसा पूर्व की तिथि निकलती है, परन्तु कुछ विद्वानों के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य 1500 ईसा पूर्व में हुआ था, यदि यह माना जाये तो 3100 ईसा पूर्व की तिथि निकलती है क्योंकि यूनान के राजदूत मेगस्थनीज़ ने अपनी पुस्तक इंडिका में जिस चन्द्रगुप्त का उल्लेख किया था वो गुप्त वंश का राजा चन्द्रगुप्त भी हो सकता है।

अधिकतर पश्चिमी विद्वान जैसे मायकल विटजल के अनुसार भारत युद्ध 1200 ईसा पूर्व में हुआ था, जो इसे भारत में लौह युग (1200-800 ईसा पूर्व) से जोड़कर देखते हैं।

खगोलीय घटनाओं के आधार पर -

भारतीय विद्वान पी वी वारटक महाभारत में वर्णित ग्रह-नक्षत्रों की आकाशीय गणनाओं के आधार पर इसे 16 अक्तूबर 5561 ईसा पूर्व में आरम्भ हुआ मानते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र तथा अष्टमी तिथि के संयोग से जयंती नामक योग में लगभग 3112 ईसा पूर्व (अर्थात आज से 5129 वर्ष पूर्व) को हुआ। ज्योतिषियों अनुसार रात 12 बजे उस वक्त शून्य काल था। इस मान से यह मान जाएगा कि महाभारत युद्ध भी 31वीं सदी ईसा पूर्व ही हुआ था।

विद्वानों का मानना है कि महाभारत में ‍वर्णित सूर्य और चंद्रग्रहण के अध्ययन से पता चलता है कि युद्ध 31वीं सदी ईसा पूर्व हुआ था लेकिन ग्रंथ का रचना काल भिन्न-भिन्न काल में गढ़ा गया। प्रारंभ में इसमें 60 हजार श्लोक थे जो बाद में अन्य स्रोतों के आधार पर बढ़ गए।

आर्यभट्ट के अनुसार महाभारत युद्ध 3137 ईसा पूर्व में हुआ और कलियुग का आरम्भ कृष्ण के निधन के 35 वर्ष पश्चात हुआ। एक नवीनतम अध्ययन अनुसार राम का जन्म 5114 ईसा पूर्व हुआ था। शल्य जो महाभारत में कौरवों की तरफ से लड़ा था उसे रामायण में वर्णित लव और कुश के बाद की 50वीं पीढ़ी का माना जाता है। इसी आधार पर कुछ विद्वान महाभारत का समय रामायण से 1000 वर्ष बाद का मानते हैं।

युद्ध के प्रथम दिन मृगशीरा नक्षत्र था। वी.बी आठावले ने अनुसार युद्ध की तिथि 3016 ईसा पूर्व है। इन्होंने अपने मत के पक्ष में तीन ठोस आधार इस प्राकर दिए हैं:-

1. युद्ध के समय 13 दिन पश्चात सूर्य एवं ग्रहण हुए हैं, जो अक्टूबर मास (अश्विून और कार्तिक) में दिखलाई दिए।

2. उसी समय पुष्य3 नक्षत्र ईसा के पश्चात्

3. इनके मत से महाभारत के भीतर ईसा के 400 वर्ष पश्चात जोड़ घटाव होते रहे हैं। जिनका उल्लेख इस पुस्तक के भीतर विस्तार सहित हुआ है। विन्टरनिट्ज के अनुसार महाभारत का प्राचीनतम रूप चौथी शती ईसा पूर्व से अधिक प्राचीन नहीं, इनके मत से महाभारत का नवीनतम रूप ईसा के 400 वर्ष पश्चात् तक विकसित होता रहा।

अधिकतर भारतीय विद्वान जैसे बी ऐन अचर, एन एस राजाराम, के सदानन्द, सुभाष काक ग्रह-नक्षत्रों की आकाशीय गणनाओं के आधार पर इसे 3067 ईसा पूर्व और कुछ यूरोपीय विद्वान जैसे पी वी होले इसे 13 नवंबर 3143 ईसा पूर्व में आरम्भ हुआ मानते हैं।

ताजा शोधानुसार ब्रिटेन में कार्यरत न्यूक्लियर मेडिसिन के फिजिशियन डॉ. मनीष पंडित ने महाभारत में वर्णित 150 खगोलीय घटनाओं के संदर्भ में कहा किमहाभारत का युद्ध 22 नवंबर 3067 ईसा पूर्व को हुआ था। उस वक्त भगवान कृष्ण 55-56 वर्ष के थे। इसके कुछ माह बाद ही महाभारत की रचना हुई मानी जाती है।

पुरातात्विक साक्ष्य -

महाभारत में वर्णित जगहों की पहचान हो जाने के बाद प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता श्री बी.बी. लाल ने 1950 के दशक में महाभारत से जुड़ी जगहों की खुदाई की। इन खुदाइयों की रिपोर्ट 'एंशिएंट इंडिया' नामक पत्रिका के अंक 10 और 11 में प्रकाशित हुईं। हम उस रिपोर्ट का सारांश प्रस्तुत कर रहे हैं।

"हस्तिनापुर (2909/ उत्तरी अक्षांश और 7803/ पूर्वी देशान्तर) उत्तर प्रदेश के मेरठ ज़िले के मवाना तहसील में है।

जब कोई हस्तिनापुर जाता है तो पूर्वी क्षितिज की ओर कई टीले नज़र आते हैं। कई जगहों पर तो ये टीले आसपास की ज़मीन से लगभग 60 फीट ऊंचे हैं। टीले पर चढ़कर गंगा नदी को देखा जा सकता है जो लगभग पांच मील दूर है। पुराने ज़माने में नदी पास में बहती थी। हस्तिनापुर के खण्डहर नदी के पुराने तट के पास लंबाई लिए हुए फैले हैं। बस्ती और ज़्यादा बड़ी रही होगी। खुदाई से पता चलता है कि गंगा नदी बस्ती का एक बड़ा हिस्सा बहा ले गई।

ऐसा लगता है कि प्राचीन काल में एक ही टीला रहा होगा। बाद के युगों में बरसात के पानी के कटाव से इन टीलों के बीच नालियां बन गईं। टीलों के ऊपर जैन और आर्य समाज के मन्दिर बने हुए हैं।

पुरास्थल का काल विभाजन

हस्तिनापुर के टीलों में चार जगह ट्रेंच खोदे गए। वहां पांच अलग-अलग अवधियों में लोगों के निवास के प्रमाण मिले हैं। निष्कर्ष इसका ये निकला की महाभारत सिर्फ कल्पना नही है बल्कि सत्य के धरातल पर फैला एक वटवृक्ष है जिसका समयकाल 2500 से 3000 ईशा पूर्व का है।

बौद्ध मत का खुद स्वीकार करना -

बौद्धों के कई ग्रंथों में महाभारत और रामायण के पात्रों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। इसी कड़ी में श्रीलंका के प्राचीन बौद्ध ग्रंथ को देखेँ जिसमें वैदिक ऋषियों के अलावा व्यास और महाभारत को स्पष्ट उल्लेख मिलता हैं-

व्यासः कणाद ऋषभः कपिलः शाक्यनायकः।

निवृत मम पश्चातु भविष्यन्त्येवमादयः।

मयि निवृते वर्षशते व्यासो वै भारतस्तथा।।

पाण्डवाः कौरवा राम पश्चान्मौर्यो भविष्यति।।

इस लंकावतार सुत्त में महाभारत और व्यास जी का स्पष्ट उल्लेख है, इससे सिद्ध है कि लंका के बौद्ध भी महाभारत और व्यास की प्राचिनता और वास्तविकता को मानते थे और जब महाभारत का उल्लेख बौद्ध साहित्य में है तो महाभारत में राम और रामायण के उल्लेख होने से रामायण की प्राचीनता स्वतः सिद्ध हो जाती है। साथ में ये भी सिद्ध होता है कि रामायण,महाभारत बौद्धो की नकल नही बल्कि बौद्ध साहित्यों द्वारा राम, भीम आदि पात्र रामायण और महाभारत में से बहुत बाद में नकल किए गए हैं।

निष्कर्ष -

इन सम्पूर्ण तथ्यो से यह माना जा सकता है की महाभारत 5000-3000 इसवी ईसा पूर्व या निशिचत तौर पर 3000 इसवी ईसा पूर्व रची गयी होगी, जो महाभारत मे वर्णित ज्योतिषिय तिथियों से मेल खाती है। इस काव्य में बौद्ध धर्म का वर्णन नहीं है, अतः यह काव्य गौतम बुद्ध के काल से पहले अवश्य पूरा हो गया था। यहाँ तक कि खुद बौद्ध साहित्य महाभारत गीता रामायण आदि की प्राचीनता स्वीकार करते हैं फिर इन जैसे आक्षेपों का कोई औचित्य ही नही रह जाता है।

अधिकतर अन्य भारतीय साहित्यों के समान ही यह महाकाव्य भी पहले वाचिक परंपरा द्वारा हम तक पीढ़ी दर पीढ़ी पहुँचा है। बाद में छपाई की कला के विकसित होने से पहले ही इसके बहुत से अन्य भौगोलिक संस्करण भी हो गये हैं जिनमें बहुत सी ऐसी घटनायें हैं जो मूल कथा में नहीं दिखती या फिर किसी अन्य रूप में दिखती है।

विशेष -

सपष्ट है कि श्रीमद्भागवत गीता बौद्ध काल से बहुत पहले से है ना कि किसी बौद्धकालीन लेखक की रचना के बाद कि नकल आशा करता हूँ इस पोस्ट से आक्षेपों का खण्डन हो गया होगा, आक्षेप लगाने वाले सज्जनों से निवेदन है कि गीता पढ़े वो गीता जिसका प्रभाव केवल भारत तक ही सीमित नहीं रहा है। इसका संदेश पहले एशिया के देशों में फैला और पिछले 200 वर्षों में यह पश्चिम में भारतीय चिंतन को समझने के लिए एक लोकप्रिय स्रोत का काम करती रही है। संसार की सभी प्रमुख भाषाओं में गीता का अनुवाद हो चुका है।

हेनरी थोरो, राफ वाल्डो इमर्सन, रोम्यां रोलां, टीएस इलियट, डब्ल्यूबी यीट्स और आन्द्रे मार्लो जैसे लेखकों, कवियों और विचारकों ने इसके संदेश को सराहा है। रॉबर्ट ऑपनहाइमर और भौतिकी में नोबेल पुरस्कार प्राप्त इर्विन श्रडिंगर जैसे प्रख्यात वैज्ञानिक भी मानते हैं कि विश्व के पीछे छिपे हुए अंतिम सत्य के ज्ञान के लिए गीता की दृष्टि बहुत सहायक है। धर्म के क्षेत्र में गीता 'सार्वभौम धर्म' का संदेश देती है जिसका पालन सभी मनुष्य कर सकते हैं। दर्शन के क्षेत्र में जिसे एल्डस हक्सले 'शाश्वत दर्शन' (Perenninal Philosophy) कहते हैं उसका सबसे अच्छा प्रतिपादन, उन्हीं के शब्दों में, गीता में ही है। इस प्रकार गीता का संदेश संसार के सभी देशों और सभी कालों के मनुष्यों के लिए उपादेय है।

सोर्स -

1 - रिपोर्ट 'एंशिएंट इंडिया'

2- महाभारत और सरस्वती सिंधु सभ्यता लेखक-सुभाष कक

3- जरनल्स ऑफ अमेरिकन सोसाइटि

4- द महाभारत-ए क्रिटिजम By सी.वी. वेदया

5- विकिपीडिया

6- बुद्ध मीमांसा - योगीराज मैत्रेय

7- रामायण मीमांसा - करपात्री जी महाराज

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