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शंकरं शंकराचार्यम् .... : Shankaracharya Jayanti 2020

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बहुत से ब्राह्मण वीरों को तो फेसबुक व्हाट्स एप पर ही पता चलता है कि वैशाख शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को भगवान शंकर ने केरल के कलाड़ी ग्राम में एक निर्धन विद्वान ब्राह्मण के घर पंचभौतिक आवरण स्वीकार किया था।

नंबूदरी ब्राह्मण कुल के शिवगुरु और उनकी पत्नी विशिष्टादेवी दोनों जीवन के उत्तरार्ध तक पहुँच गए थे किंतु संतान सुख नहीं था।

भगवती ललिताम्बा और दक्षिणामूर्ति शिव की अहर्निश अयाचक भक्ति अगम्य दिशा में स्पंदन कर गई और इनके यहां पुत्र रूप में वो जन्मा जो सबका पिता है। जो अनादि अनंत है। जो देव नहीं है..... महादेव है।

बाल्यकाल में ही बालक शंकर ने अपने दिव्य जन्म का एक विशेष उद्देश्य इंगित कर दिया था। ८ वर्ष की आयु में आसपास के क्षेत्र में कोई ऐसा गुरु नहीं बचा था जिसमें शंकर को शिक्षा देने की योग्यता हो।

इस समय तक पिता का देहावसान हो चुका था।

एक दिन शंकर की विलक्षण प्रतिभा की चर्चा सुनकर कुछ दैवज्ञ ब्राह्मण इनके घर पधारे। कुछ देर के वार्तालाप ने तय कर दिया कि ये ८ वर्ष का बालक वस्तुतः कोई ज्ञानवृद्ध ऋषि है।

दैवज्ञों ने शंकर की कुंडली का अध्ययन किया और बताया कि "इनके जीवन में अवतार योग है। किसी विशेष कार्य के लिए ऐसे जन्म होते हैं। परिव्राजक होने की संभावना प्रबल है। किंतु साथ ही अल्पायु योग भी है। आठवें, सोलहवें और बत्तीसवें वर्ष में काल की दृष्टि पड़ेगी। आठवें वर्ष में भक्ति और तप से मृत्यु टल सकती है किंतु सोलहवें वर्ष में भगवान शिव ही रक्षक हैं।"

बेचारी माता तो घबरा गई। पर शंकर ने इसे अलग ढंग से ले लिया। अगले दिन सुबह सुबह ये गांव के सरोवर में एक मगर के मुख में पैर दिए दिखे। माता को समाचार मिला। दौड़ पड़ी। वृद्धा का इस आयु में और दूसरा कोई नहीं था। सरोवर पर पहुंच कर देखा निर्लिप्त भाव से शंकर खड़े मानो मां की प्रतीक्षा में ही हों।

आते ही मां के समक्ष शर्त रखी कि "तुम यदि मुझे संन्यास की अनुमति दो तो ये मगर मुझे छोड़ सकता है।"

मानो मानवताको संदेश दे रहे थे कि मृत्यु रूपी ग्राह से बचना है तो संन्यास रूपी शस्त्र रखो।

भयभीत मां ने अनुमति दी। किंतु इस शर्त के साथ कि जब वो देह त्यागे तो पुत्र अपना धर्म निभाने कहीं से भी आए। और अंतिम संस्कार करे।

शंकर ने वचन दिया और विद्वानों के बताए अनुसार उत्तर की ओर बढ़ गए।

गुरु और शिष्य का मिलन सृष्टि की सबसे विलक्षण घटना है।

बढ़ते बढ़ते शंकर नर्मदा मैया के तट पर ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग आ पहुंचे। यहां एक गुफा में गौड़पादाचार्य के शिष्य गोविंदपादाचार्य समाधिस्थ थे।

इनका एक अंतिम ऋणानुबंध बच रहा है जिसे संन्यास दीक्षा देकर इनका उद्देश्य पूर्ण होना था। उस एक साधक के लिए गोविंपाद सदियों से समाधिस्थ थे।

शंकर के पहुंचते ही भगवन् का समाधि से व्युत्थान हुआ और गुरु शिष्य संबंध जाग्रत हुआ।

वर्षाकाल में गुरु की समाधि में विघ्न आने की आशंका देख शंकर ने अद्भुत नर्मदाष्टक की तत्क्षण रचना की और मां नर्मदा को अपने कमंडल में बांधकर उफनने से रोका।

गोविंदपाद अपने शिष्य की विलक्षणता से परिचित थे किंतु योगविभूति को प्रकट करने के लिए उन्होंने ये लीला रची।

शंकर को शंकराचार्य बनाने के बाद गोविंदपाद ने समाधि में लीन हो देह विसर्जन कर दिया।

संन्यासी शंकराचार्य अब काशी की ओर बढ़ गए।

शंकराचार्य के समय सनातन वैदिक धर्म का भारी ह्रास हो गया था। जैनों और बौद्धों ने वर्धमान महावीर और तथागत बुद्ध के नाम पर अपने को स्वतंत्र घोषित कर दिया था और राजसत्ता को अपने प्रभाव में लेकर वैदिक धर्म को नष्ट करने पर तुले हुए थे।

बुद्ध के अनुयायियों में बुद्धत्व का कोई अंश नहीं बचा था। समस्त बौद्ध तंत्र के वाममार्ग का अनुसरण करते हुए विचित्र विरोधाभास प्रकट कर रहे थे।

गौतम बुद्ध के समय के धम्म से इस नवोदित बौद्ध तंत्र प्रधान वज्रयान मार्ग का कोई साम्य नहीं बैठ रहा था।

जनता इनसे दुखी हो गई थी।

सनातन धर्म भी पतन की पराकाष्ठा पर था। कुछ जरा से लोगों के लिए अनुमोदित वामतंत्र वैदिक अनुष्ठानों में प्रवेश कर चुका था। वाममार्ग प्रदर्शन के लिए नहीं है किंतु शंकर ने देखा सात्विक साधना का पूर्णतया लोप होने को है और कोई समझ नहीं रहा।

काशी में कुछ समय रहकर शंकराचार्य ने सभी स्थापित मठों को शास्त्रार्थ की चुनौती दी। इसमें पराजित विद्वान को विजेता के मत में अपने शिष्यों सहित दीक्षित होना होता था

समस्त भारत में भ्रमण करते हुए शंकराचार्य ने तत्कालीन हर परंपरा से बौद्धिक युद्ध किया और पराजित करके अद्वैत मत में दीक्षित कर संन्यासी बनाया।

इसका दूरगामी परिणाम ये हुआ कि शांकर परंपरा बौद्धिक समृद्धि के शिखर पर जा पहुंची। जैन, बौद्ध, पाशुपत, पांचरात्र , कौल, कापालिक, भैरव इत्यादि संप्रदायों के प्रखर विद्वान शंकराचार्य से भिड़े और यूथ के यूथ वेदांत महासागर में समाहित हो गए।

प्रचंड प्रज्ञा के इस तूफान से वज्रयान बौद्ध धर्म तिनके की भांति उड़ा और तिब्बत में सिमटकर रह गया। अन्य सभी सनातनी धारा में समाहित हो गए।

उपेक्षित नागजाति को अवधूत मत में दीक्षित कर भगवान ने सशस्त्र नागा संन्यासी दलों के ७ अखंड स्थापित करवाने का महत् कार्य संपन्न किया।

पूर्व में जगन्नाथ क्षेत्र में गोवर्धनमठ, पश्चिम में द्वारका में शारदामठ, उत्तर में ज्योतिर्मठ और दक्षिण में श्रृंगेरीमठ की स्थापना और सुदृढ आचार्य परंपरा को स्थापित करने के बाद मात्र ३२ वर्ष की आयु में शंकराचार्य ने केदारनाथ ज्योतिर्लिंग क्षेत्र में समाधिस्थ हो लीला संवरण किया।

आज भी शांकर परंपरा बौद्धिक समृद्धि और साधना के ऐश्वर्य से सुसज्जित सनातन धर्म को पथ प्रदर्शन में लगी है।

ये कोई साधारण गुरु घंटालों की गैंग नहीं है। हजारों मसालेदार चटपटे संप्रदाय उदित हो कर काल के अंधकार में विस्मृत हो चुके हैं। और आगे भी होंगे।

किंतु शंकर प्रदत्त प्रखर आलोकित मोक्ष पथ अपने पथिक को सदैव दिशाबोध कराता रहेगा।

क्योंकि ....... शंकरं शंकराचार्यम्।

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