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"हर काम देश के नाम" पहल की श्रृंखला में "उद्योगों में जल उपयोग क्षमता में वृद्धि" कार्यशाला आयोजित

"हर काम देश के नाम" पहल की श्रृंखला में "उद्योगों में जल उपयोग क्षमता में वृद्धि" कार्यशाला आयोजित

जल संसाधन सचिव ने "उद्योगों में जल उपयोग क्षमता में वृद्धि" पर कार्यशाला का उद्घाटन किया

श्री यूपी सिंह ने सीएसआर प्रावधानों की श्रृंखला में उद्योग-जगत से कॉर्पोरेट जल दायित्व (सीडब्ल्यूआर) को अपनाने का आह्वान किया

भारत सरकार के जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण विभाग (डब्ल्यूआर, आरडी एंड जीआर) के सचिव श्री यू.पी. सिंह ने उद्योग जगत से कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) प्रावधानों की श्रृंखला में कॉरपोरेट जल दायित्व (सीडब्ल्यूआर) को अपनाने का आह्वान किया है। राष्ट्रीय जल मिशन (एनडब्यून एम) द्वारा आज यहां "हर काम देश के नाम" पहल की श्रृंखला में आयोजित "उद्योगों में जल उपयोग क्षमता में वृद्धि" पर कार्यशाला के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए, श्री सिंह ने कहा कि वैश्विक मानकों की तुलना में, हमारे उद्योग अभी भी पानी का बहुत ही अक्षम उपयोग करते हैं। उन्होंने कहा कि पानी की खपत को कम करने के लिए पानी के उपयोग पर विभिन्न उद्योगों में आधारभूत अध्ययन की आवश्यकता है।

भूमिगत जलस्तरर के घटने के बारे में चिंता व्यक्त करते हुए श्री यूपी सिंह ने कहा कि हम भूमिगत जलस्तर को बनाए रखने के लिए अनुकूल दोहन की तुलना में 2.5 गुना अधिक भू-जल खींच रहे हैं। भू-जल संसाधनों के अत्यखधिक दोहन के कारण हमें पानी की कमी का सामना करना पड़ता है।

श्री यूपी सिंह ने कहा कि झारखंड या छत्तीसगढ़ की 3000 टन की तुलना में भारत का अनाज भंडार समझे जाने वाले पंजाब और हरियाणा प्रति हेक्टेयर 5000 टन अनाज उत्पादन करते हैं, लेकिन झारखंड और छत्तीसगढ़ में जल की प्रति इकाई उत्पादकता पंजाब और हरियाणा से काफी अधिक है। उन्होंने कहा कि हमारे लिए वास्तविक चिंता बुंदेलखंड जैसे परंपरागत रूप से सूखे क्षेत्र नहीं हैं, बल्कि पंजाब और हरियाणा की स्थिति से हम चिंतित हैं।

श्री यूपी सिंह ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण हाल के वर्षों में स्थान और समय की दृष्टि से वर्षा की स्थिति में बदलाव हुआ है। परिणामस्वरूप हमें बार-बार सूखा और बाढ़ का सामना करना पड़ेगा।

इस अवसर पर अपर सचिव तथा एनडब्ल्यूएम के मिशन निदेशक श्री जी अशोक कुमार ने कहा कि कागज और लुगदी उद्योग पानी की खपत आधा कम करने में सफल हुए हैं, लेकिन अभी बहुत कुछ किया जाना है क्योंकि वैश्विक मानकों से यह खपत अभी भी 5 से 10 गुना अधिक है।

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