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Dar al-Islam का सपना - शाहीनबाग का धरना एक "संयोग नही प्रयोग है"...

Dar al-Islam का सपना - शाहीनबाग का धरना एक संयोग नही प्रयोग है...

ये चित्र का इतिहास French Revolution (क्रांति) से जुड़ा हुआ हैं। जिसमें एक अर्धनग्न स्त्री बच्चे संग हथियार उठाये फ्रांस राजशाही के विरुद्ध लड़ती हुई दिखाई प्रतीत हो रही हैं।

अब जरा शाहीनबाग धरने पर ध्यान दीजिए। यहाँ भी मुसरिम महिलाएं बच्चों सँग युद्ध की भाँति बैठी हैं। बस अंतर इतना हैं कि, उनके हाथों में हथियार नही हैं। लेकिन उनके जहरीले बोल किसी हथियार से कम भी नही हैं।

शाहीनबाग मात्र एक धरना प्रदर्शन नही अपितु उस फ्रेंच रिवोल्यूशन के बीज भारत में बोना हैं, जिसने फ्रांस सहित समूचे यूरोप को हिला दिया था।

जिस कौम को आप जाहिल या मरदसा छाप समझते हैं, असल में वह आपके IIT, IIM पढ़े युवाओं से कहीं अधिक चतुर व लक्ष्य के प्रति स्पष्ट हैं।

उम्माह में आधुनिक इस्लामिक क्रांति स्वयं को French Revolution से जोड़कर देखती हैं। लेकिन आपको इनके मंसूबों के बारे में रत्तिमात्र भी ज्ञान नही हैं।

उसी क्रांति का आईकॉन नारा हैं:- "ला इलाह इललिल्लाह"..

ला इलाह मात्र एक धार्मिक नारा नही हैं.. जैसे भारत के बुद्धिजीवी, सेक्युलर, लिबर्ल्स आपको बताते हैं.. अपितु इसका संबंध दारुल हर्ब (गैर इस्लामिक) देशों में तख्तापलट से है..

जहाँ-जहाँ किसी राजनीतिक शक्ति ने इस्लाम को मुख्य धारा से जोड़ने का प्रयत्न किया.. कट्टरपंथ से बाहर लाने का प्रयास किया तब-तब ये नारा "ला इलाह इललिल्लाह" बुलन्द हुआ हैं.. उस राजनीतिक शक्ति को उखाड़ फेंकने के लिए।

कुछ दिन पूर्व एक IIT कालेज में फैज की नज्म के साथ लगे नारे "सारे बुत उखाड़े जाएंगे, बस नाम रहेगा अल्लाह का... ला इलाह इललिल्लाह" कोई जवानी के जोश में लगा नारा नही था। बल्कि एक नियोजित नीति के तहत पूरे होशोहवास में लगाया गया नारा था।

आगे बढ़ने से पूर्व फ्रेंच रिवोल्यूशन के बारे में अति संक्षेप में जान लीजिए.. 1789-1799 के मध्य फ्रांस के इतिहास में तानाशाही राजसत्ता के विरूद्ध गणतंत्र स्थापित करने हेतु चली क्रांति को फ्रेंच रिवोल्यूशन कहा जाता हैं.. जिसने फ्रांस के राजनीतिक इतिहास को बदलकर रख दिया.. ईरान में 1979 में हुई क्रांति भी इसी से जोड़कर देखी जाती हैं।

किन्तु प्रश्न ये उठता हैं, भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में फ्रेंच रिवोल्यूशन की क्या भूमिका ??..

प्रश्न उचित भी हैं, लेकिन इस्लाम हर उस देश की सत्ता को अस्वीकार करता हैं, जहाँ शरीयत क़ानून नही हैं। हर उस विचार को तानाशाह मानता हैं, जहाँ उसे मुख्य धारा में लौटने का आह्वान किया जाता हैं।

इसे इस तरह से समझिए...

मोदी सरकार-2 के शुरू होते ही कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी पार्टियां "लोकतंत्र खतरे में हैं", "लोकतंत्र बचाना हैं" जैसे नरेटिव अलाप रही हैं। वह भी तब, जब देश में लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई प्रचंड बहुमत की सरकार हैं।

पिछले एक वर्ष से कांग्रेस तुर्की के सम्पर्क में हैं.. जो आधुनिक इस्लामिक क्रांति का मुख्य केंद्र रहा हैं.. कांग्रेस का पूर्ण रूप से इस्लामिक परस्त हो जाना उसी का संकेत हैं.. कांग्रेस को किसी भी कीमत पर सत्ता चाहिए.. फिर चाहे इसकी कीमत सन 47 जैसा एक और विभाजन या गजवा हिन्द ही क्यों न हो।

इन सब खतरनाक षड्यंत्रों से बेखबर हिन्दू कांग्रेस, आप सँग लोकतंत्र के नारे लगा रहा हैं। खुद ही अपने हाथों अपनी कब्र खोदने में लगा हैं।

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शायद मोदी सरकार को इस बात का इल्म था। अतः उन्होंने शाहीनबाग को पूर्णरूपेण नजरअंदाज किया। क्रिया की प्रतिक्रिया स्वरूप उसे "क्रांति" नही बनने दिया।

आज शाहीनबाग की हालत उस चूसे हुए गन्ने की भाँति हो गई हैं, जो चाहे मशीन में पड़ा रहे या रद्दी की टोकरी में उसका कोई महत्व नही।

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