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मोदी हत्या की साजिश: सत्ता लोलुपों का छद्म सेकुलरवाद बेनकाब

मोदी हत्या की साजिश: सत्ता लोलुपों का छद्म सेकुलरवाद बेनकाबसेकुलरों, मरा हुआ मोदी तुम्हारे लिए ज़िंदा मोदी से ज़्यादा भयानक सिद्ध होगा। सिर्फ अपने सत्ता लालच के लिए देश को ग्रहयुद्ध की आग में क्यों झोंकना चाहते हो?

प्रधानमंत्री की हत्या की साज़िशें न रचिए, शहीद मोदी की जन-स्मृतियाँ और ज़्यादा तीक्ष्ण, जीवन्त और शाश्वत होंगी।

विश्व भर की सभ्यताओं में "राजनैतिक हत्याएँ" होती रही हैं। सत्ता की महत्वकांक्षा जघन्य अपराध और साज़िशें करवाती आई है जिससे कोई भी साम्राज्य या लोकतंत्र अछूता नहीं रहा है।

स्वतंत्रता के तुरंत बाद देश ने गाँधी की हत्या की त्रासदी झेली। देश स्तब्ध रह गया, जबकि इस हत्या का सत्ता पर काबिज़ होने की इच्छा से कोई सीधा रिश्ता नहीं था।

कालांतर में हमने गाँधी की हत्या को एक insignia, मोमेंटो, एक प्रतीक बनते देखा। गाँधी की निर्मम हत्या शारीरिक और मानसिक हिंसा का प्रतीक बन गई। इस हिंसा पर अहिंसा की विजय को प्रदर्शित करना आवश्यक था।

गाँधी क्राइस्ट की तरह त्याग, शहादत की प्रतिमूर्ति बन गए और इसके साथ ही साथ एक दूसरा समुदाय और संगठन बेहिसाब नफ़रत का शिकार बन गया। जिस शख्स ने हत्या की, उससे जुड़ी हर वस्तु, उसका धर्म, समुदाय, संगठन हिंसा का पर्याय माना जाने लगा नाथूराम गोडसे का हिन्दू होना, बहुसंख्यक समुदाय से होना, राजनैतिक संगठन से होना इन सारी बातों ने विरोधियों को बड़ा बिंदु दे दिया और कालांतर में गाँधी के विरुद्ध कुछ भी बोलना "नाथूराम गोडसे" होना हो गया।

गाँधी की हत्या के बाद देश ने दूसरी राजनैतिक हत्या देखी।

इंदिरा की हत्या भी सत्ता के लिए नहीं हुई। इस शहादत ने प्रतिक्रिया में हिंसा का वीभत्स मंजर देखा। शरीरिक हिंसा ही नहीं, मानसिक हिंसा के प्रति भी अत्यंत संवेदनशील होने का संदेश देने वाले गाँधी के अनुयायी हिंसक होते दिखे। दोबारा से एक पूरे समुदाय और संगठन को गुनाहगार मान उनसे इंदिरा के हत्या का बदला लिया गया।

देश ने राजीव गांधी को जब खोया तो यह उन्माद नहीं दिखा और राजीव की हत्या पर हत्यारों को माफ़ी दे दी गई।

जनता की स्मृतिओं में जो परिवर्तन दिखता है वह ये कि इंदिरा की हत्या अब राजनैतिक मुद्दा नहीं बनती, राजीव की हत्या तो इस क़दर भुला दी गई है मानों उनकी हत्या हुई ही न हो।

वह हत्या जिसका ज़िक्र अखबारों में, टेलीविजन पर, बहसों में, राजनैतिक मंचो पर, किताबों में लिखी और कही जाती है वह है गाँधी की हत्या। ज़िक्र इसलिए क्योंकि इस ज़िक्र से फायदा है, राजनैतिक लाभ लेने को पार्टियाँ एक-दूसरे को आरोपित करती हैं, वोट-बैंक की राजनीति होती है और गाँधी की हत्या भूलने नहीं दी जाती। गाँधी की हत्या भुलाई नहीं जाती, इसे भूलने नहीं दिया जाता क्योंकि यह हत्या एक पार्टी की नैतिक हार की तरह उभर आती है। इसे सुन कर लोग चुप हो जाते हैं, सर झुका लेते हैं और एक अपराध बोध को जीते हैं।

वामपंथी इसे कभी भूलने नहीं देंगे क्योकि हत्यारा हिन्दू है, बहुसंख्यक समुदाय का है और इससे हिंदुओ के पक्ष को कमज़ोर कर पाने की बहुमूल्य मदद मिलती है। यह हत्या किसी के व्यक्ति का जघन्य अपराध न होकर उस पूरी आवाज़ का अपराध हो जाता है जो गाँधी की गोद ही हुई पार्टी के विरोध में उठती है। यहाँ गाँधी क्राइस्ट होते हैं और उनकी पार्टी के विरोधी यहूदी।

यही देखते हुए ये जान लीजिए कि अगर नरेन्द्र मोदी की हत्या आपने करा दी तो इतिहास में आपने अपने जघन्य कृत की वो दास्तां लिख दी है जिसकी भावुकता,विषाद के सम्मुख हो सकता है कि गाँधी फीके पड़ जाएं। मोदी की जन-स्मृतियाँ जो राष्ट्र के पटल पर अंकित होंगी, वह आपको न चैन से जीने देंगी, न मरने।फिर आपकी विचारधारा और उसकी तथाकथित सच्चाई पर किसी को कोई दिलचस्पी नहीं रह जायेगी।

नरेंद्र मोदी की हत्या के सलीब के नीचे दब कर आपके सारे आदर्श दुबारा से खड़े नहीं हो पाएँगे। जनता में व्याप्त उनकी हत्या और मृत्यु की स्मृतियाँ आपके किसी भी माफीनामे को स्वीकार नही करेगी और किसी भी कोर्ट के हस्तक्षेप को अनसुना कर देगी। यह दुख और क्षोभ आपको जनता का विश्वास हासिल करने नहीं देगा।

मोदी और गाँधी में वही अंतर है, जो गाँधी और झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई में है। बुंदेलखंड की जनता आज भी रानी को ज़िंदा मानती है, उंन्हे गीतों में बुलाती है, रिझाती है, जिसके पीछे का कारण उनका राज्य से और उसकी जनता से प्रेम रहा, जिसे आज के संदर्भों में आप देशभक्ति कह सकते हैं। अगर गाँधी क्राइस्ट की तरह त्याग, दया, करुणा और शहादत के प्रतीक बन गए तो हिंदुओं की स्मृतियाँ मोदी को विषपान करने वाले शिव की श्रेणी में रख देंगी जो अपने कर्मों और इच्छाओं में सत्य और सुंदर है और इसलिए शास्वत हो चुका है।

राष्ट्र भक्ति अगर बलिदान माँगती है, तो बलिदानियों को भगवान की श्रेणी में खड़ा कर डालती है। अंग्रेजों ने जिन देशभक्तों को मारा, उनके थान अब भी हैं जहाँ उनकी पूजा होती है। फिर जनता की performative memory स्मृति यह नहीं देखती कि वह ठाकुर है, ब्राह्मण है या कोई अन्य जाति।

नरेंद्र मोदी को भूल जाइए और उनकी हत्या को भी क्योंकि फिर यह मंज़र तो आपके लिए और भयावह होगा जब मौत के बाद वो और ज्यादा तीक्ष्ण, जीवन्त और शास्वत हो जाएंगे और फिर आप अपने गले से नरेंद्र मोदी की हत्या का अल्बाट्रोस पक्षी कभी नहीं उतार पाएँगे।

वो हैं के वफ़ाओं में खता ढूँढ रहे हैं, हम हैं के खताओं में वफ़ा ढूँढ रहे हैं।
हम हैं खुदा परस्त दुआ ढूँढ रहे हैं, वो इश्क के बीमार दवा ढूँढ रहे हैं।
तुमने बड़े ही प्यार से जो हमको दिया है, उस ज़हर में अमृत का मज़ा ढूँढ रहे हैं। (अंसार कम्बरी)

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