शरिया कोर्ट / दारुल क़ज़ा : भारतीय संविधान को खुली चुनौती ?

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मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने न्यायपालिका में विश्वास की कमी प्रदर्शित की जब उन्होंने एक ही बार में दिये/कहे गए "ट्रिपल तालक" को अमान्य करार दिये गए सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का समर्थन नहीं किया।

अब, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने घोषणा की कि वे देश के हर एक जिले में शरिया न्यायालय स्थापित करने की योजना बना रहे हैं, उनका कहना है, "हे सुप्रीम कोर्ट! आप हमारे लिए वास्तव में सर्वोच्च नहीं हैं। अगर सर्वोच्च न्यायालय और शरिया के बीच चुनाव करना पड़े तो हम शरिया का चयन करेंगे। "

यह भारतीय संविधान को खुले तौर पर चुनौती देने से कम नहीं है।

भारत सरकार को AIMPLB को देश में शरिया अदालतों की स्थापना की अपनी योजना को निष्पादित करने का आदेश देना चाहिए है। यह चेतावनी दी जानी चाहिए कि भारतीय संविधान को कमतर करने वाले किसी भी व्यक्ति को सख्ती से दंडित किया जाएगा।

संविधान की सर्वोच्चता किसी भी कीमत पर बनाए रखा जाना चाहिए।

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संपादकीय नोट:

आज के संदर्भ में देखा जाए तो भारत में हिन्दू/सनातन धर्म के अलावा अनेक संप्रदाय/पंथ हैं जिन्हें आजादी के बाद से ही अल्पसंख्यक का दर्जा प्राप्त है और उन्हीं में से एक है इस्लाम। भारत की सांसकृतिक विशेषता और बहुसंख्यक हिंदुओं की सहहृदयता के कारण अनेकों धर्म-संप्रदाय सदियों से साथ मिलकर रहते आ रहे है। भारत में जिस भी धर्म या संप्रदाय ने स्थान मांगा, सनातन धर्म ने उसे हमेशा खुले दिल से शरण दी। और आज 21वीं सदी में सभी धर्म-संप्रदाय भारतीय संविधान के राज में सुकून से रह रहें है। परंतु मुस्लिम धर्म के द्वारा बार-बार शरिया एवं मुस्लिम पर्सनल लॉं बोर्ड की मांग भारत को वापस से गुलामी के उस दौर की याद दिलाती है जहां भारत आज़ादी की कगार पर खड़ा था परंतु मुस्लिम लीग की गलत मांगों ने देश के टुकड़े कर दिये।

ज़रा सोचिए हमारे देश में सैकड़ों धर्म-संप्रदाय हैं, यदि सभी इसी प्रकार अपने - अपने "निजी कोर्ट" की मांग करने लगे तो क्या होगा?

मुस्लिम पर्सनल लॉं बोर्ड की यह मांग देश के सामने एक चुनौती के रूप में खड़ी है।


आखिर क्यों मुसलमानों को ही "पर्सनल लॉं बोर्ड और शरीय अदालत" की आवश्यकता हैं? क्या उनके अनुसार भारत का सर्वोच्च न्यायालय देश में लॉं एंड ऑर्डर स्थापित करने के लायक नहीं है? क्या आज मुसलमान शरिया को सर्वोच्च न्यायालय से ऊपर मानने लगे हैं?

इसमें कोई दोराय नहीं है, कि यदि सरकार ने शीघ्र ही शरिया के खिलाफ ठोस कदम नहीं उठाए तो इस प्रकार ना केवल सर्वोच्च न्यायालय कि अवमानना होगी अपितु देश में एक गृह युद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न होने की संभावना बलवती होगी।

मूल अंग्रेजी लेख : Rakesh Srivastava जी, हिन्दी अनुवाद : Shreshtha Verma

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