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ईद पर बकरों की खालों का नदी में विसर्जन

विडियो देखकर चौंक गए न आप? किस प्रकार ये लोग बकरीद पर ज़िबह किए गए सैंकड़ों बकरों की चमड़ी नदी में फेंक रहे हैं। ये विडियो देख कर किसी का भी दिल दहल जाएगा, किस प्रकार नदियों के पानी को प्रदूषित किया जा रहा है। आज कहाँ है वो सभी लोग जो दुर्गा पूजा का विरोध करते नहीं थकते? हम किसी भी रूप से जल प्रदूषित करने के पक्ष में नहीं है परंतु दुर्गा मूर्तियों की मिट्टी तो फिर पानी में घुल जाती है, परंतु ये बकरे की खालें पानी को किस हद तक प्रदूषित कर रही है आप अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते।

और साथ ही आपने विडियो के शुरुआत में वीडियो में दिखाई दे रहे लोगों द्वारा एक सफ़ेद प्लास्टिक बैग को नदी में फेंकते देखा होगा, आपको बता दें कि उस प्लास्टिक बैग में बकरों के शरीर के वो आंतरिक हिस्से है जो शायद इन मुसलमानों को हज़म नहीं होते, जैसे कि आंते । अब आप अंदाज़ा लगा सकते है प्लास्टिक जो खुद ही पर्यावरण के लिए बहुत हानिकारक है, उसमें भरी बकरों की आंते गलने में कितने वर्षों का समय लेंगी।

आप देख सकते है किस प्रकार ये लोग दिन दहाड़े बेखौफ हो कर नदी में बकरों की खालें फेंक रहे हैं।

दिवाली पर पटाखों की बिक्री बंद करने वाली एनजीटी और सुप्रीम कोर्ट कहाँ गायब है आज? क्यों एनजीटी बकरों की खाल के इस प्रकार विसर्जन पर रोक नहीं लगाती ? या सारा प्रदूषण और स्वास्थ्य की सुरक्षा की याद हिंदुओं के त्यौहारों पर ही आती है?

ये तो हुई जल प्रदूषण की बात, इसके अलावा ईद के मौके पर वायु प्रदूषण भी उतनी ही तेज़ी से बढ़ता है, परंतु कोई एनजीटी या संस्थान उसका ब्योंरा देने आगे नहीं आता। हम सभी जानते है कि यदि बहुत सारे जानवरों को एक साथ एक ही स्थान पर रखा जाए तो कैसी जानलेवा दुर्गंध उठती है, सोचिए उन बकरों की बदबू से किस प्रकार आसपास रहने वालों का जीना दुश्वार हो जाता है।

परंतु इस जल और वायु प्रदूषण के लिए उन बड़बोले नेताओं और तथाकथित बुद्धिजीवियों के मुंह पर तले पड़ जाते है, आखिर ऐसा क्यों है? क्या इसीलिए कि बात मुसलमानो की है, जो निस्संदेह अधिकतर राजनीतिक दलों का वोट बैंक है?

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