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विपक्ष को संयुक्त होते देख शाह ने कमर कसी

विपक्ष को संयुक्त होते देख शाह ने कमर कसी2019 की तैयारी में जुटे मोदी-शाह

2019 के लिए विपक्ष की संयुक्त ताकत को देखकर बीजेपी भी अपना कुनबा मज़बूत करने की शुरूआत कर रही है। इसी सिलसिले में बीजेपी ने संपर्क अभियान की शुरुआत की है। बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष राम विलास पासवान से मुलाकात की है। इस संपर्क समर्थन अभियान के दौरान अमित शाह देश के बड़े नेताओं से मुलाकात करने वाले हैं। इस कड़ी में शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे के अलावा अकाली दल के प्रकाश सिंह बादल से भी बीजेपी के अध्यक्ष मुलाकात करेंगे।

बीजेपी 2019 के आम चुनावों से पहले सभी सहयोगी दलों से गिले-शिकवे दूर करने की कोशिश कर रही हैं। उम्मीद है अमित शाह के सक्रिय होने से इस विपक्षी महागठबंधन की कोशिश को नुकसान पहुंच सकता है क्योंकि क्षेत्रीय दलों के पास विकल्प रहेगा कि वो बीजेपी वाले गठबंधन का हिस्सा बनें या फिर कांग्रेस के नेतृत्व वाले महागठबंधन में शामिल हो जाएं। परंतु बीजेपी के इस बात को ध्यान में रख कर चलना होगा कि क्षेत्रीय दल चुनावी मौसम के साथ बदल सकते हैं। इस बात से अमित शाह अंजान नहीं हैं।

अमित शाह को लग रहा है कि इस बार किसी लहर के अभाव में तिनका-तिनका जोड़कर ही काम चलाया जा सकता है, जिसमें छोटे दलों के नेताओं की भूमिका अहम हो जाएगी।

बीजेपी पर दलित विरोधी होने के इल्जाम लग रहे हैं। कैराना में दलित मुस्लिम की जुगलबंदी की वजह से बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा है। इसलिए सोच-समझकर लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष से अमित शाह ने मुलाकात की है। एक तो बीजेपी दलित समुदाय को पैगाम देने की कोशिश कर रही है कि बीजेपी दलित विरोध में नहीं है।

बीजेपी ने दलित कार्ड खेलने में भी कोई कमी नहीं छोड़ी है। पहले रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति बनाया है। और वर्तमान स्थिति में एनडीए के पास मायावती के काट के लिए सिर्फ राम विलास पासवान ही हैं, जिनके ज़रिए दलित समुदाय को साधा जा सकता है। हालांकि पासवान का असर सिर्फ बिहार तक सीमित है। बिहार में एक बड़ा गठबंधन ही आरजेडी-कांग्रेस के गठबंधन को रोक सकता है। 7 जून को बिहार बीजेपी की तरफ से महाभोज दिया जा रहा है, जिसमें बिहार के एनडीए के बड़े नेता शामिल हो रहे हैं।

बिहार में अभी बीजेपी के साथ जेडीयू, आरएलएसपी और रामविलास पासवान ही हैं। ये तीनों दल गाहे-बगाहे मोदी सरकार की आलोचना करते रहते हैं। रामविलास पासवान पाला बदलने में माहिर खिलाड़ी हैं। उपेंद्र कुशवाहा ने दिल्ली में लालू प्रसाद से मुलाकात की थी। जिसके कई मायने निकाले जा रहे हैं। दरअसल यूपी में एसपी-बीएसपी के एक साथ आ जाने से बीजेपी सकते में हैं। बीजेपी इस गठबंधन की भरपाई के लिए और राज्यों की तरफ निगाह कर रही है क्योंकि यूपी में अपना दल और ओम प्रकाश राजभर की पार्टी ही बीजेपी के साथ है। लेकिन राजभर के तेवर भी लगातार तल्ख हो रहे हैं।

दूसरी ओर महाराष्ट्र में गठबंधन की मज़बूती बीजेपी के लिए जरूरी है। शिवसेना महाराष्ट्र में और केंद्र में सरकार का हिस्सा है। लेकिन मोदी सरकार में उद्धव ठाकरे के तेवर कड़े हैं। उद्धव कई बार राहुल गांधी की भी तारीफ कर चुके हैं। बीजेपी शिवसेना ने 2014 में 42 सीटें जीती थीं। गठबंधन में दरार आने से ये सीटों का आंकड़ा काफी कम हो सकता है। ऐसे में जब कांग्रेस और एनसीपी एक साथ चुनाव लड़ने का मन बना रहे हैं, बीजेपी और शिवसेना का अलग होना राज्य में नुकसानदेह साबित होगा। हाल में ही हुए उपचुनाव में शिवसेना ने अलग चुनाव लड़कर ये दिखाया है कि बीजेपी से अलग होने की बात सिर्फ धमकी मात्र नहीं है।

वहीं एनडीए का दक्षिण में कोई साथी नहीं बचा है। एआईएडीएमके बीजेपी के साथ तो है लेकिन लोकसभा चुनाव में एआईएडीएमके की क्या ताकत बचेगी ये कहना मुश्किल है। लेकिन बीजेपी के साथ कोई दल आने के लिए तैयार नहीं है। डीएमके का कांग्रेस के साथ रिश्ता चल रहा है। एमके स्टालिन कांग्रेस का साथ छोड़ने के मूड में नहीं है। सीटों के एतबार से तमिलनाडु बड़ा राज्य है। इस तरह कर्नाटक में जेडीएस वाला दांव कांग्रेस ने मार दिया है। ममता बनर्जी की अदावत बीजेपी से जगजाहिर है, टीआरएस चुनाव पूर्व बीजेपी के साथ आने में दिक्कत है क्योंकि मॉइनॉरिटी वोट खिसकने का डर है। नवीन पटनायक एनडीए से पहले अलग हो चुके हैं लेकिन पटनायक कांग्रेस के साथ ना जाएं ये कोशिश जरूर बीजेपी कर रही है।

एक तरह से बीजेपी के सामने 2004 जैसे हालात खड़े हो गए हैं। बीजेपी का कुनबा घट रहा है और विपक्ष का कुनबा बढ़ रहा है। 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी के सामने कोई नेता नहीं था। 2019 में मोदी के सामने कोई नेता टिक नहीं पा रहा है। लेकिन इसमें भी दोराय नहीं है कि एक बड़ा गठबंधन बीजेपी का साम्राज्य बिखेर सकता है। और बीजेपी को इसका अंदाजा भली भांति हो गया है। खासकर यूपी के उपचुनाव से, जहां कैराना में मुस्लिम उम्मीदवार को जाट और दलित का वोट मिला है। यह महागठबंधन यूपी में तो सफल हुआ है आगे देखने वाली बात होगी कि मोदी-शाह की जोड़ी इस महागठबंधन से कैसे लड़ेगी?

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