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भय की खेती के सहारे एक मज़हब

क्या आपको इस्लाम का भय है? कभी-कभी तो मुझे लगता है कि समय के साथ कभी शूरवीर कहे जाने वाले हम हिन्दू एक डरपोक और कायर समाज बनते जा रहे हैं।

यदि आप सबको मेरी बात का बुरा लगा तो माफ कीजिएगा लेकिन मेरा यही इरादा था कि आप को बहुत बुरा लगे क्योंकि, मुझे सलमान रश्दी तस्लीमा नसरीन वाला मामला अभी तक याद है और, उस मामले ने मुझे जो झटका दिया था वो भी अब तक याद है।

महज़ एक किताब लिखने से किसी की जान को खतरा हो सकता है मुझे यह भयानक कल्पना ही पल्ले पड़ नहीं रही थी।

लेकिन समय के साथ अब तो हम हिन्दू पहले से ये मानकर ही चलते हैं कि अगर किसी ने शांतिधर्म (मुस्लिम और इस्लाम) के बारे में कुछ कडवे सत्यों के विषय में लिखा तो उसे मुस्लिमों की तरफ से धमकियाँ मिलनी ही है और, वे मारे भी जा सकते हैं।

शायद यही कारण है कि अधिकतर लोग अपना मुंह बंद रखने में ही भलाई समझते हैं वो भी सब सहिष्णुता और विविधता के नाम पर।

और सिर्फ इतना ही क्यों आज टीवी और अखबार वाले तक खुद ही अपने को इतने सेंसर (censor) करते हैं जिसकी कल्पना भी करना कुछ दशकों पहले असंभव था।

लेकिन आज ये टीवी और अखबार वाले खुद को सेंसर इसलिए नहीं करते हैं कि वे संवेदनशील हैं जैसा कि वे दर्शाते हैं, बल्कि इसलिए करते हैं क्योंकि, वे मुस्लिमों के हिंसा से डरते हैं और उनका तो दुःख ये है कि वे अपना ये डर बताने से भी डरते हैं ताकि, मुस्लिम इसका बुरा न मान जाएँ।

लेकिन सिर्फ मीडिया ही क्यों हालत तो इतने बदतर हो चुके हैं कि जब कभी हम जैसे लोग किसी चौक-चौराहे या बस-ट्रेन वगैरह में इस्लाम और मुस्लिमों की सच्चाई बताने का प्रयास करते हैं तो लोग धीमे से इशारा करते हैं कि चुप हो जाओ नहीं तो दंगा हो जायेगा।

और तो और बहुत सारे लोग तो इस्लाम की हकीकत बताती लेखों को पढ़ते हैं और उससे सहमति भी जताते हैं लेकिन, डर के मारे उस लेख को लाइक तक नहीं कर पाते तथा, अपने हाथों की कंपकंपाहट को वे इनबॉक्स में अपनी मज़बूरी कह कर बताते हैं।

लेकिन अगर मुझे कोई बात ज़बरदस्त खटक रही है तो यह कि पेट्रोल-डीजल और रोटी खिलाने के नाम पर जमकर बवाल करने वाले लोग इस पर आश्चर्यजनक रूप से चुप हैं।

एक वर्ष में लगभग 84 हजार रेप और रेप के बाद जघन्य हत्या की रिपोर्ट है, जिसमें से 76 हजार के आसपास में मुस्लिम पुरूष शामिल हैं और लगभग 80 हजार पीड़िता हिंदु है क्या इसपर कोई तथाकथित निरपेक्षती वादी बहस करेगा आखिर कौन सी मानसिकता है जो काफिरो की चीख पर जश्न मनाने को अपनी गौरव गाथा मानती है?

क्या उसे रौंदा जाना आवश्यक नहीं? सिर्फ हिंदुओं को एकतरफा अहिंसा, सहिष्णुता आदि का जहर दशकों से पिलाते रहना और बर्बर मानसिकता वालो की हिमायत करना जघन्य पाप है, इसकी सजा आपलोग ही भुगतते हैं, और हिंदुवादी संगठनों को बाद में कोसते हैं कि ये नहीं किया वो नहीं किया। अबे! संघ क्या कोई फरिश्ता है जो तुम्हारी बहन बेटियां बचाता फिरे? वो एक संगठन है जिसमें लोग ही होते हैं तुमने कब भरा था अपने परिवार में ये संस्कार?

ये ही भोपाड़ी के हमें चुप रहने कहेंगे, कहेंगे कि सबको पता है पर बोलना जरूरी है???

मानो कि शायद अब जैसे हमें आदत सी हो गयी है कि इस्लाम एक हिंसक मजहब है।

हालांकि यह बात कहने की किसी को भी इजाजत नहीं है लेकिन, आज हर किसी को यह पता है कि अगर मुस्लिमों पर लगाम लगाने की कोशिश की जाएगी तो वे दंगा शुरू कर देंगे।

और यही आज हमारे हिंदुस्तान सहित बाकी मुक्त कहलाते दुनिया की वास्तविकता है।

आप सोचकर हैरान हो जायेंगे कि महज 60 -65 साल पहले दंगों का डर दिखाकर इन मुल्लों ने हमसे पाकिस्तान और बांग्लादेश ले लिया। और महज 60 -65 साल में ही हमारी हालत यह हो गयी है कि जो भी हम कहते या करते हैं तो हमें मजबूरन ये सोचना होता है कि मेरे इस काम से मुस्लिम दंगों पर उतारू तो नहीं हो जाएँगे?

यहाँ तक कि एक सादा चित्र बनाने के पहले भी यह सोचना हर किसी के लिए ज़रूरी हो जाता है। आखिर आतंक की व्याख्या और क्या होती है?

नासमझ लोग ठीक से इस बात को समझ लें कि यह एक सांस्कृतिक आतंक है और हम बेशर्मी से उसकी आरती उतार रहे हैं जो हमारे लिए डूब मरने की बात है ।

हालाँकि हम दंभपूर्वक कहते हैं कि उनका बर्ताव सभ्यतापूर्ण नहीं है लेकिन कोई अगर इस बात पर लोगों का ध्यान खींचे तो लोग उस पर ही टूट पड़ते है और उसे वंशवादी कह कर गाली देते हैं साथ ही उसे आरएसएस का एजेंट करार देते हैं क्योंकि लोग यह मान कर चलते हैं कि इस मुस्लिम समाज को कोई उकसाये तो ये लोग आपा खो कर हिंसक हो जाएँगे।

और अगर ये हिंसक हो गए तो गुनाह हमारा ही है कि क्योंकि शायद उन मुस्लिमों को हमारे ही किसी कृति पर इन्हे गुस्सा आया होगा।

अर्थात हम यही मान कर चलते हैं कि हिंसा होगी और हिंसा न हो इसीलिए हम पहले से ही घुटने मोड लेते हैं। हम ऐसा इसीलिए नहीं करते हैं कि हम विकसित या उदार मत वाले हैं बल्कि ऐसा कर के बस हम ही अपने आप को बहला रहे हैं क्योंकि हम झूठे, ढ़ोंगी और डरपोक हैं।

हद तो ये है कि हम इसे अपनी गलती भी नहीं मानना चाहते हैं।

बल्कि इसे हम अपनी कायरता को सुंदर शब्दों में सजाते हैं जैसे कि सहिष्णुता, सम्मान, उदारवाद आदि और, ऐसा कहकर हम खुद ही के लिए तालियाँ बजाते हैं कि हम कितने उच्च विचारोंवाले लोग हैं। लेकिन हम सब जानते हैं कि हमारी वीरता मर चुकी है और, अब उसके लाश की दुर्गंध इतनी है कि कुछ भी करो, दबती नहीं ।

दरअसल इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि हमारी यह पहली पीढ़ी है जिसे अपने स्वातंत्र्य के बचाव लिए लड़ना नहीं पड़ा है और यह हमारे व्यवहार में दिख भी रहा है।

इसीलिए हम ना तो इस स्वत्रन्त्रता की क़द्र करते हैं और, न ही कीमत जानते हैं क्योंकि हमें यह विरासत में मिली है तथा इसे हमने अपनी मेहनत से कमाया नहीं है।

इसीलिए अब तो सभी को साफ दिख रहा है कि स्वस्थ समाज के लिए अत्यावश्यक ऐसे एक तत्व का हमारे आँखों के सामने विनाश हुए जा रहा है और हम इतने डरपोक हैं की इस जघन्य अपराध में हमारी अपनी भागीदारी से भी आँख चुराते हैं।

सच कहूँ तो, आज हम हिन्दू वो डाकुओं की फिल्मों के गाँववाले हैं जो एक बुरे आदमी से हमेशा डरे-डरे रहते हैं, ('शोले' याद है ? ठाकुर ने हिजड़ों की फौज पाल रखी है) और आप भी जानते हो कि आप जब ऐसी फिल्म देखते हैं तो आप को उनपर दया नहीं आती है क्योंकि वे उस लायक नहीं होते और आप सोचते हो कि वे डरपोक है इसीलिए, वे डरने के सिवा और कर भी क्या सकते है?

अब जरा ध्यान से उन गांववालों के चेहरे को देखें अरे, वो गांववाले तो हमारा हिन्दू समाज ही है जिन्होंने अपने आप को इन मुस्लिमों के आतंक-धमकियों डर कर इतना self censor कर लिया है कि हम ही मुक्त विचार को ख़त्म किए जा रहे हैं और चाहे-अनचाहे मुस्लिमों की दासता स्वीकार करते जा रहे हैं।

लेकिन ये हमेशा याद रखें कि इसी विचारधारा के कारण अब होगा ये कि हमारी आनेवाली पीढ़ियाँ जब पैदा होंगी तो हम से कम स्वातंत्र्य अनुभव करेंगी जो धीरे-धीरे कश्मीर और पाकिस्तान की तरह इस्लाम के झंडों तले रौंद दी जाएगी।

ये कभी मत भूलें कि……. अगर हमारा हिन्दू आज भी नहीं जागा तो………

हमारी दांभिकता,बुजदिली और कायरता की कीमत …………हमारी आनेवाली पीढ़ियाँ चुकाएंगी…!

जय महाकाल…!!!

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