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परम्परागत कठपुतली कला का अस्तित्व ले रहा है अंतिम साँसे ?

परम्परागत कठपुतली कला का अस्तित्व ले रहा है अंतिम साँसे ?परम्परागत कठपुतली कला का अस्तित्व ले रहा है अंतिम साँसे

उदयपुर 17 दिसम्बर (वार्ता) : संचार एवं विकास के आधुनिक दौर में सरकारी सूचना और सामाजिक संदेश मनोरंजन के साथ आमजन तक पहुंचाने वाली परम्परागत कठपुतली लोक कला संकट के दौर में हैं।
कठपुतलियों को विभिन्न प्रकार की गुड्डे गुडियों, जोकर आदि पात्रों के रुप में बनाया जाता है। लकडी से पुतली बनाई जाती है इसलिए इसे माहौल कठपुतली कहा जाता हैं। देश में साक्षरता अभियान, बाल विवाह, स्वच्छ भारत मिशन अभियान, लोकतंत्र में मतदान के लिए जागरूकता अभियान जैसे आमजन को उनकी अपनी संस्कृति एवं भाषा में जागरूक करने के लिए कठपुतलियां माहौल को जीवंत कर देती हैं।
राजस्थान, उडीसा, कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश में कठपुतलियों की शैली ज्यादा प्रचलित हैं। धागे के सहारे इन कठपुतलियों को नियंत्रित किया जाता हैं। कठपुतलियों की वेशभूषा पर उस राज्य प्रांत का विशेष असर होता हैं। मिसाल के तौर पर उडीसा में कठपुतलियां सखी कुंधेई कहलाती हैं। तमिलनाडु में कठपुतलियां धागे के साथ साथ छड़ से भी जुडी होती हैं इनको बोम्मलअट्टम कहा जाता हैं। प्रत्येक कठपुतली धागे से कठपुतली संचालक के सिर पर बंधे लोहे के छल्ले से जुडी होती हैं इससे संचालक को मनमुताबिक अपने हाथों से संचालित करने की छूट रहती हैं।
पश्चिम बंगाल में कठपुतली छड़ के नाम से प्रचलित है, इसे पुतल नाच कहा जाता है। इसमें तात्रा शैली के परिधान का उपयोग किया जाता हैं। कर्नाटक में काम्बे अट्टा, केरल में थोलपावा कुतू और उडीसा में रावण छाया के नाम से प्रिय हैं।
राजस्थान में कठपुतली का इतिहास काफी पुराना है और यहां की लोक कलाओं तथा कथाओं से जुडा है। पिछले कुछ वर्षो से राज्य में परम्परागत रीति रिवाजों पर आधारित कठपुतली के खेल में काफी परिवर्तन हो गया हैं। अब यह खेल सडकों, गलियों में न होकर रंग, आकार, गति और संगीत के संगम के साथ फ्लड लाइट्स की चकाचौंध रोशनी में बड़े मंच पर होने लगा हैं। गांवों से लेकर शहरों तक कद्रदानों की कमी और राजकीय संरक्षण एवं प्रोत्साहन के अभाव में यह लोक कला कहीं लुप्त न हो जाए। कुछ वर्ष पहले तक राजस्थान के गांव गांव में कठपुतली का खेल दिखाया जाता था लेकिन अब यह बात नहीं है।
छोटे छोटे लकडी के टुकडों और कटे फटे कपडों के साथ गोटे और बारीक काम से बनी राजस्थान की कठपुतलियां हर किसी को मंत्र मुग्ध कर लेती है लेकिन यहां कठपुतली की बनावट से भी ज्यादा उसका खेल , प्रदर्शन , मंत्रमुग्ध करने वाला होता हैं। राज्य में राजा-रानी, सेठ-सेठानी, जमींदार किसान और जोकर आदि पात्रों को लेकर ज्यादा कठपुतलियां बनाई जाती हैं। राजस्थान में कठपुतली खेल में हर क्षेत्र के अनुसार भाषा और क्षेत्रीय रंगत रहती है। यहां कठपुतली के खेल में कथाएं, संवाद या गीत सभी प्रदर्शन साधारण जीवन के अंग होते हैं और अपने आप में लोक कला के उत्कृष्ट नमूने माने जाते हैं।
प्रारंभ से लेकर आज तक कठपुतली कला का विविध रूप में विकास होता आया हैं। राज्य की कठपुतली कला को न केवल देश में बल्कि विदेशों में भी लोकप्रियता मिली हैं। वर्तमान समय में कठपुतली कला में आधुनिकता का प्रवेश हो जाने के कारण उसके लौकिक स्वरूप में गिरावट आई हैं।
राजस्थान में ऐसे कई परिवार है जिनकी कमाई का एक मात्र साधन कठपुतली बनाकर बेचना और खेल दिखाना हैं। कठपुतली से जीविकापार्जन करने वाले इन परिवारों में स्त्रियां और बच्चे कठपुतली की पोशाकें तैयार करने और पुरूष कठपुतली का ढांचा बनाने, रंग करने और खेल दिखाने का काम करते हैं, लेकिन आज जिस तरह से कठपुतली खेल की लोकप्रियता घटती जा रही है उन हालात में ये परिवार अपने पुश्तैनी धंधे को छोड रहे हैं, कई लोग मजबूर होकर खेल दिखाने के बजाए कठपुतली बनाने तक ही अपना काम सीमित कर रहे हैं।
कुछ वर्षो पहले तक देश विदेश में नाम कमाने वाली कठपुतली कला आज कारीगरों एवं कद्रदानों को तरस रही हैं। राजों, रजवाडों के संरक्षण में फली फूली इस कला के कारीगरों की संख्या घट रही हैं। अब इस कला के बहुत कम कलाकार रह गए हैं।
हालांकि राजस्थान में कठपुतली के कद्रदानों की संख्या घट रही है लेकिन अन्य जगहों और विदेशी लोगों में यह कला लोकप्रिय भी हो रही हैं। कई विदेशी आज कठपुतलियों के अच्छे दाम तो देते ही है साथ ही उन्हें नचाने की कला भी सीखते हैं। कई पर्यटक तो सजावटी चीजें, स्मृति एवं उपहार के रुप में कई कठपुतलियां यहां से ले जाते हैं। परन्तु इन बेची जाने वाली कठपुतली का लाभ यहां बडे बडे एम्पोरियम के विक्रेताओं को ही हो रहा हैं जबकि इसको बनाने वाला कारीगर आज भी रोजी. रोटी को मोहताज हैं।
बहरहाल सरकार की उपेक्षा के कारण राज्य में कठपुतली कला संकट के दौर से गुजर रही है और अगर समय रहते इसको राजकीय संरक्षण एवं प्रोत्साहन नहीं मिला तो कहीं यह कला विलुप्त न हो जाए। अत: परम्परागत कठपुतली कला को टूटने से बचाने तथा वर्तमान समयानुसार परिवर्तन एवं सुधार करने की आवश्यकता हैं।

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