किस्सा-ए-हिजरा: पार्ट-2

किस्सा-ए-हिजरा: पार्ट-2

एक व दो जून, 1920 को इलाहाबाद में हुई खिलाफत कमेटी की बैठक में खिलाफत कमेटी के एक नेता ने गुस्से में कसम खाई की मुसलमान हिजरा के लिए अफगानिस्तान जाएंगे और वहां की फौज में भर्ती होने के बाद भारत पर हमला कर इसे अंग्रेजों के चंगुल से आजाद कराएंगे। हिंदुओं व सिखों में इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई जिसके बाद खिलाफत आंदोलन के बड़े नेता हसरत मोहानी ने लीपापोती करते हुए कहा कि भारत पर हमला करने वालों को मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा चाहे वह अंग्रेज हों या मुसलमान।
मोहानी की बातों को कौम ने रत्ती भर तवज्जो नहीं दी। उन्होंने कपड़े सिलवाए, माल असबाब इकट्ठा किया और पेशावर रवाना हो गए। जुलाई आते-आते पूरा पेशावर शहर मुहाजिरीन की भीड़ से अस्त व्यस्त हो गया और मस्जिदों व सरायों में तिल रखने की भी जगह नहीं बची थी। तीस हजार से ज्यादा लोग अफगानिस्तान में दाखिल हो चुके थे और 40 हजार से भी ज्यादा पेशावर में अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। अफगानिस्तान का अमीर अमानुल्ला अपने ही जाल में फंस गया था। वो तो बस सौदेबाजी के लिए इन मोमिनों को हिजरत की दावत दे रहा था। उसने तुरंत पलटी मारी और मुहाजिरीनों के काफिले को रोकने के लिए ब्रिटिश सरकार सरकार से बातचीत शुरू कर दी और तिकड़में भी आजमाई।
शुरु में लगभग दस हजार मुहाजिरीन तो आराम से अफगानिस्तान में दाखिल हो गए पर जुलाई आते-आते हिजरत पर निकले मुहाजिरीनों को यह जान कर सदमा लगा कि 'दारूल इस्लाम' में दाखिल होने की कीमत है और वो भी 50 रुपए प्रति परिवार "और ये 1920 का वाकया है"। हिजरत को उतावले मोमिनों ने यह रकम जुटाने के लिए अपने घरबार और मवेशी बेच डाले। पंजाब और सीमांत प्रांत में 10000 रुपए के खेत 100 रुपए में बिके तो 20 रुपए की भैंस दो रुपए में। (हिंदू) बनिये मालामाल हो रहे थे। आखिर में लैंडी कोटल के सात हजार पठानों को अफगानिस्तान जाने की इजाजत देने के बाद दारूल इस्लाम में घुसने पर इतनी पाबंदियां आयद की गईं की बाकी लोग पेशावर में ही फंसे रह गए। इसके बावजूद अगस्त तक साठ हजार मुहाजिरीन अफगानिस्तान में दाखिल हो चुके थे। जो खैबर दर्रे से नहीं घुस पाए वो मोहमंद के रास्ते पहुंचे। बहुत से उत्साही बलूचिस्तान के रास्ते दाखिल हुए। लेकिन अगस्त आते-आते जब लैंडी कोटल के ये पठान अफगानिस्तान में दाखिल हुए, हिजरत का जोश ठंडा पड़ चुका था। मई-जून में जो मुहाजिरीन हिजरा के लिए 'दारूल इस्लाम' में दाखिल हुए थे, वो अब लुट-पिट कर धीरे-धीरे घर वापसी करने लगे थे।
जो मुहाजिरीन लौटकर पेशावर तक पहुंच पाए, उनकी हालत "रोहिंग्या" से भी बदतर हो चुकी थी। हिजरा के उनके किस्से खौफनाक थे। जबाल-उस-सराय की वो रीयल स्टेट उन्हें कहीं नहीं दिखी जहां इन मुहाजिरीनों की खातिरदारी की जानी थी। बस ये रहा कि शुरू में अफगानी अमीर ने इनके काफिलों को सेना की सुरक्षा दी और लुटेरे कबाइलियों को इनसे दो हाथ दूर रखा। साथ ही, मुल्ला-मस्जिद नेटवर्क की मदद से ऐसा माहौल बनाया कि कबाइलियों ने इन मुहाजिरीनों को रास्ते में शर्बत भी पिलाया। लेकिन जैसे ही अफगान अमीर अमानुल्ला को हिजरा की व्यर्थता समझ में आई, उसने मुहाजिरीनों को अपने हाल पर छोड़ दिया। उनके काफिलों की सैन्य सुरक्षा वापस ले ली।
इसके बाद इन 'दीनी खिदमतगारों' को असली अफगानियत और पख्तूनियत से रूबरू होना पड़ा। अफगान अफसरों ने काबुल जाने वालों और लौटकर पेशावर आ रहे लोगों से पांच-पांच रुपए वसूलने शुरू कर दिए। पैसे नहीं मिलने पर जो था वो छीन लिया और मारा-पीटा भी। महिलाओं और बच्चों तक को नहीं बख्शा। बाकी कसर कबाइलियों ने पूरी की। मार पीट कर इनके कपड़े तक उतरवा लिए। जिनके कपड़े बच गए, उन्होंने उसे ही बेच कर खाना और पानी खरीदा। फिर भी भूख, प्यास और बीमारियों से हजारों मुहाजिरीनों ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया। काबुल से पेशावर के रास्ते में जगह-जगह इन मुहाजिरीनों की कब्रें थीं। प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं कि खैबर दर्रे में इन मुहाजिरीनों की लावारिश लाशें बिखरी हुई थीं।
हिजरत कमेटियों के सामने मुश्किल पेश आई की इनके गुस्से को संभालें कैसे क्योंकि मुसलमान होकर मुसलमानों से धोखा खाए ये 'दीनी खिदमतगार' रट लगाए बैठे थे कि गांव जाकर सबसे पहले उस मुल्ले को जिबह करेंगे जिसने उसे हिजरा पर भेजा। हिजरत कमेटियों के नेताओं की हालत भी उतनी ही बुरी थी। चर्चा थी कि हिजरत कमेटी के नेता लरकाना के जाम मुहम्मद और और टहकल के अरबाब रजा खान किसी तरह से काबुल से भागने की फिराक में हैं। वैसे भी खान के दो बेटे बगैर जंग लड़े शहीद हो गए थे।
लेकिन मुहाजिरीनों के गुस्से से डरे मुल्लों ने फिर खेल किया। लौट रहे लोगों को बताया कि लौटने वाले मुहाजिरीनों की अंग्रेज जलालाबाद में नाक-कान काट रहे हैं और महिलाओं के साथ बलात्कार हो रहा है। मुहाजिरीनों के लिए अब आगे कुआं, पीछे खाई था। डर के मारे कुछ ने मोहमंद के रास्ते लौटने की कोशिश की जो और भयावह साबित हुआ। लूटपाट के बाद कई मुहाजिरीनों को सीधे गोली मार दी गई। हालांकि 75% मुहाजिरीन लौटने में कामयाब हो गए। यानी बाकी के 15000 रास्ते में भूख-प्यास और मारपिटाई के कारण निपट गए। बहुतों को बंधुआ मजदूर बना लिया गया।
"द सिख" की बातें सही साबित साबित हुईं। लेकिन इसने सेक्यूलर इतिहासकारों को धर्मसंकट में डाल दिया। हिजरा पर गए मुसलमानों के साथ जो हुआ, उसकी कल्पना कर उनकी आंख से झर-झर आंसू बहने लगे। उन्होंने सोचा- अगर ये किस्सा आम हो गया तो फिर एक मुसलमान का दूसरे मुसलमान से भरोसा उठ जाएगा। इसलिए सर्वसम्मति से उन्होंने इस किस्से को इतिहास से दफा कर दिया।


बेवकूफों को कौन समझाए। कौम के मनोबल पर इन एकाध झटकों का कोई असर पड़ने वाला नहीं था। ठीक 27 साल बाद वे फिर हिजरा पर निकल पड़े। इस बार कायद ए आजम साहब ने उन्हें समझा दिया था कि अब तुर्की-वुर्की को भूल जाओ। पाकिस्तान नया मदीना होगा, उम्मा का नया नेता होगा। यह नया मदीना इस्लाम की पुरानी हैसियत वापस लाने का प्लेटफार्म बनेगा। यूपी-बिहार के बहुत से जमींदारों ने 1947 में भी यही समझा कि वो हिजरा पर जा रहे हैं। उन्होंने अपने रिश्तेदारों-कारिंदों को घर की चाभी थमा कर कहा..... हवेली संभाल कर रखना। हम हिजरा पर जा रहे हैं। लौटेंगे तब लालकिले पर हरा झंडा फहराने के बाद हम सीधे अपने पुरखों की हवेली में आएंगे। लेकिन कराची पहुंचते ही इनका फिर पख्तूनों से पाला पड़ गया। उन्होंने उनके लखनवी पैजामे फाड़ कर पठानी सलवार पहना दिया। अपने इतिहासकारों ने ये भी नहीं बताया। पर पाकिस्तान क्यों इस पर शर्मसार हो। वहां सैकड़ों शोध उपलब्ध हैं जिसमें मुहाजिर बताते हैं कि हम तो हिजरा पर आए थे, पर हमें क्या पता था कि मुल्क इस तरह बर्बाद और लालकिला पहुंच से इतनी दूर हो जाएगा।

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