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खण्डन – भूमिहार कौन (Who are Bhumihar) ?

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मानव जीवन मे मूलभूत आवश्यकताओं रोटी, कपड़ा और मकान के अलावा जो एक चीज़ सभी को चाहिए होती है वो है "प्रसिद्धि"… इसको प्राप्त करने के 2 तरीके हैं एक है अच्छे मार्ग से और एक है शार्टकट यानी बुरा रास्ता, आजकल प्रसिद्धि के लिए लोग बेहतर नही बल्कि शॉर्टकट का इस्तेमाल करने में ज्यादा विश्वास रख रहे हैं क्योंकि इसमें समय नही लगता और आप रातों रात प्रसिद्ध हो जाते हैं। लेकिन मेरे भले मित्रो उसे बदनाम होना कहते है, विकल्पों का चुनाव ही आपका भविष्य तय करता है लेकिन चुनाव हमेशा अच्छे मार्ग का करना चाहिए।
इसी प्रसिद्धि के खेल में एक जाति को प्रोवोग किया जा रहा है वो है "भूमिहार"। भूमिहारों को लेकर मन मे सबके हमेशा एक रहता है कि ये 'ब्राम्हण हैं या क्षत्रिय', ये किस वर्ग में आते हैं या इनका कोई अलग ही वर्ग है, तो आप अपनी जानकारी दुरुस्त कर लीजिए। भूमिहार ब्राह्मणों का एक शक्तिशाली वर्ग है जो अयाचक ब्राम्हण में आता है।
ब्राह्मणों का अभिन्न अंग भूमिहार...
आइये तथ्यों को देखते हैं कि वैदिक साहित्य, ऐतिहासिक साहित्य और लोक कथाएं क्या कहती हैं कैसे ब्राम्हण हैं ये;
1 – वैदिक साहित्य में भूमिहार या अयाचक ब्राम्हण --
ब्राह्मणों के कर्म विभाजन से मुख्यतः दो शाखाएं अस्तित्व में आयीं –
प्रथम -- पौरोहित्यकर्मी या कर्मकांडी याचक
द्वितीय -- अध्येता और यजमान अयाचक
आसान शब्दो मे -- दान लेने वाला याचक और दान देने वाल अयाचक ।
अयाचक का कर्म --
मनुस्मृति के अनुसार -
सेनापत्यं च राज्यं च दण्डनेतृत्वमेव च।
सर्वलोकाधिपत्यं च वेदशास्त्र विदर्हति॥100॥
अर्थात -
सैन्य और राज्य-संचालन, न्याय, नेतृत्व, सब लोगों पर आधिपत्य, वेद एवं शास्त्रादि का समुचित ज्ञान ब्राह्मण के पास ही हो सकता है, न कि क्षत्रियादि जाति विशेष को।''
स्कन्दपुराण के नागर खण्ड 68 और 69वें अध्याय में लिखा हैं कि जब कर्ण ने द्रोणाचार्य से ब्रह्मास्त्र का ज्ञान माँगा हैं तो उन्होंने उत्तर दिया हैं कि :
ब्रह्मास्त्रां ब्राह्मणो विद्याद्यथा वच्चरितः व्रत:।
क्षत्रियो वा तपस्वी यो नान्यो विद्यात् कथंचन॥ 13॥
अर्थात् -
ब्रह्मास्त्र केवल शास्त्रोक्ताचार वाला ब्राह्मण ही जान सकता हैं, अथवा क्षत्रिय जो तपस्वी हो, दूसरा नहीं। यह सुन वह परशुरामजी के पास, "मैं भृगु गोत्री ब्राह्मण हूँ," ऐसा बनकर ब्रह्मास्त्र सीखने गया हैं।'' इस तरह ब्रह्मास्त्र की विद्या अगर ब्राह्मण ही जान सकता है तो युद्ध-कार्य भी ब्राह्मणों का ही कार्य हुआ।
अयाचक ब्राम्हण जो शस्त्र शिक्षा देते थे और राज्य कर्म करते थे वो अयाचक ब्राम्हण में आते थे।।
एक अन्य उदाहरण --
महाभारत में अर्जुन ने युधिष्ठिर से शान्तिपर्व में कहा है कि:
ब्राह्मणस्यापि चेद्राजन् क्षत्राधार्मेणर् वत्तात:।
प्रशस्तं जीवितं लोके क्षत्रांहि ब्रह्मसम्भवम्॥अ.॥22॥
''हे राजन्! जब कि ब्राह्मण का भी इस संसार में क्षत्रिय धर्म अर्थात् राज्य और युद्धपूर्वक जीवन बहुत ही श्रेष्ठ हैं, क्योंकि क्षत्रिय ब्राह्मणों से ही उत्पन्न हुए हैं, तो आप क्षत्रिय धर्म का पालन करके क्यों शोक करते हैं?'
कुछ अन्य उदाहरण जिससे ये सिद्ध होता है कि कुछ क्षत्रिय से ब्राम्हण भी बने, कुछ अयाचक से याचक ब्राम्हण बने तो कुछ याचक से अयाचक --
1- वाल्मीकिरामायण के के अयोध्या कांड बत्तीसवें सर्ग के २९-४३वें श्लोक में गर्ग गोत्रीय त्रिजट नामक ब्राह्मण की कथा से अयाचक से याचक बनने का सटीक उदाहरण मिलता है:-
तत्रासीत् पिंगलो गार्ग्यः त्रिजटो नाम वै।
द्विज; क्षतवृत्तिर्वने नित्यं फालकुद्दाललांगली॥29॥
इस आख्यान से यह भी स्पष्ट हैं कि दान लेना आदि स्थितिजन्य गति हैं, और काल पाकर याचक ब्राह्मण अयाचक और अयाचक ब्राह्मण याचक हो सकते हैं और इसी प्रकार अयाचक और याचक ब्राह्मणों के पृथक्-पृथक् दल बनते और घटते-बढ़ते जाते हैं
2 - क्षत्रिय जो भार्गव वंश में सिम्मलित हुआ वह राजा दिवोदास का पुत्र मित्रायु था। मित्रायु के बंशज मैत्रेय कहलाये और उनसे मैत्रेय गण का प्रवर्तन हुआ।
भार्गवों का तीसरा क्षत्रिय मूल का गण वैतहव्य अथवा यास्क कहलाता था। यास्क के द्वारा ही भार्गव वंश अलंकृत हुआ। इन्होंने निरूक्त नामक ग्रन्थ की रचना की। परशुराम के शत्रु सहस्रबाहु के प्रपौत्र का नाम वीतहव्य था। उसका कोई वंशज पुरोहित बनकर भार्गवों में सिम्मलित हो गया और उसके वंशज वैतहव्य अथवा यास्क कहलाने लगे।
निष्कर्ष -- ब्राह्मणों के कर्म निर्धारण --
अध्यापनमध्यायनं च याजनं यजनं तथा।
दानं प्रतिग्रहश्चैव षट् कर्माण्यग्र जन्मन:॥10।75॥
मनुस्मृति के इस श्लोक के अनुसार ब्राह्मणों के छह कर्म हैं
साधारण सी भाषा में कहें तो अध्ययन-अध्यापन (पढ़ना-पढाना), यज्ञ करना-कराना, और दान देना-लेना , इन कार्यों को दो भागों में बांटा गया है।
धार्मिक कार्य और जीविका के कार्य
अध्ययन, यज्ञ करना और दान देना धार्मिक कार्य हैं तथा अध्यापन, यज्ञ कराना (पौरोहित्य) एवं दान लेना ये तीन जीविका के कार्य हैं
ब्राह्मणों के कार्य के साथ ही इनके दो विभाग बन गए
एक ने ब्राह्मणों के शुद्ध धार्मिक कर्म (अध्ययन, यज्ञ और दान देना) अपनाये और दूसरे ने जीविका सम्बन्धी (अध्यापन, पौरोहित्य तथा दान लेना) कार्य
जिस तरह यज्ञ के साथ दान देना अंतर्निहित है वैसे ही पौरोहित्य अर्थात यज्ञ करवाने के साथ दान लेना
साधारण सामान्य भाषा में --
अयाचक ब्राह्मण:– जिन्होंने पुरोहिताई को अपनी आजीविका का साधन नहीं बनाया, जिनकी अजीविका का साधन कृषि, जमींदारी, राज पाट आदि थे।
परंतु दोनों ही प्रकार के ब्राह्मणों में आजीविका छोड़ कर अन्य सभी बातों में समानता थी।
साधना, स्वाध्याय, अध्ययन, अध्यापन तपश्चर्या आदि। और वही अयाचक बाद में भूमिहार बने ।।
2 – लोक कथाओ में भूमिहार ब्राह्मण --
प्रथम - भगवान परशुराम जी ने क्षत्रियों को पराजित कर जो ज़मीन थी, उसे ब्राह्मणों को दे दिया, जिसके बाद ब्राह्मणों ने पूजा-पाठ का परम्परागत पेशा छोड़ जमींदारी शुरू कर दी और बाद में युद्ध में प्रवीनता भी हासिल कर ली थी। ये ब्राह्मण ही भूमिहार ब्राह्मण कहलाये। और तभी से परशुराम जी को भूमिहारो का जनक और भूमिहार-ब्राह्मण वंश का प्रथम सदस्य माना जाता है।
द्वितीय - 1037 ब्राह्मणों को पाटन के महाराज मूलराज सोलंकी ने ऋषि कोडिन्य के परामर्श से अपने पाप के प्रायश्चित करने हेतु गुजरात आमंत्रित किया था। इन एक हजार सेंतीस विद्वान ब्राह्मणों को विधि और यज्ञादी के पश्चात पूजन कर आभूषण वस्त्र, भूमि, भवन स्वर्णादी दान देना, चाहा था। शास्त्रों के अनुसार धन लेना, अनुचित माना जाता था। अत: इसे सभी ने अस्वीकार कर दिया- राजा चिंतित हो गया, क्योंकि यज्ञादी का पूर्ण फल प्राप्त करने दान दिया जाना आवश्यक था। ओर भोजन तथा दान समंग्री ग्रहण नहीं की वे ब्राह्मण अयाचक ब्राह्मण कहे गए।
अयाचक राज्य के शासकीय, नैतिक, धार्मिक व न्यायिक क्षैत्रों में शासक का सर्वोच्च सलाहकार था। यहाँ तक ही नहीं आवश्यकता पडने पर अयाचक ने सैन्य संचालन भी बहुत ही बहादुरी व कुशलतापूर्वक किया। इस प्रकार यह जाति हमेशा जन्म से ब्राह्मण व कर्म से क्षत्रिय रही। शासकों द्वारा अयाचक को इनके शौर्य एवं वीरता के फलस्वरूप कई जागीरें बख्शी गई व कई तरह के सम्मान भी दिये गये।
ऐतिहासिक प्रमाणों में भूमिहार ब्राम्हण -
प्रथम - अरस्तू के संस्मरण ग्रंथो में ब्राह्मण शासकों का उल्लेख --
"Now the ideas about castes and profession, which have been prevalent in Hindustan for a very long time, are gradually dying out, and the Brahmans, neglecting their education,....live by cultivating the land and acquiring the territorial possessions, which is the duty of Kshatriyas. If things go on in this way, then instead of being Master of learning, they will become Master of land".
"जो विचारधारा, कर्म और जाति प्रधान भारतवर्ष में प्राचीन काल से प्रचलित थी, वह अब धीरे-धीरे ढीली होती जा रही हैं और ब्राह्मण लोग विद्या विमुख हो ब्राह्मणोंचित कर्म छोड़कर भू-संपत्ति के मालिक बनकर कृषि और राज्य प्रशासन द्वारा अपना जीवन बिता रहे हैं जो क्षत्रियों के कर्म समझे जाते हैं। यदि यही दशा रही तो ये लोग विद्यापति होने के बदले भूमिपति हो जायेगे।''
द्वितीय - चीनी यात्री फ़ाह्यान के संस्मरण गर्न्थो में ब्राह्मण शासकों का उल्लेख:
In the year 399 A.D. a Chinese traveler, Fahian said "owing to the families of the Kshatriyas being almost extinct, great disorder has crept in. The Brahmans having given up asceticism....are ruling here and there in the place of Kshatriyas, and are called 'Sang he Kang", which has been translated by professor Hoffman as 'Land seizer'.
अर्थात "क्षत्रिय जाति करीब करीब विलुप्त सी हो गई है तथा बड़ी अव्यवस्था फ़ैल चुकी है
ब्राह्मण धार्मिक कार्य छोड़ क्षत्रियों के स्थान पर राज्य शासन कर रहे हैं"
अयाचक ब्राम्हण से भूमिहार शब्द --
भूमिहार शब्द का प्रचलन या प्रयोग सबसे पहले 1526 ई० में बृहतकान्यकुब्जवंशावली में किया गया है।
'बृहत्कान्यकुब्जकुलदर्पण' (1526) के 117वें पृष्ठ पर मिलता है
इसमें लिखा हैं कि कान्यकुब्ज ब्राह्मण के निम्नलिखित पांच प्रभेद हैं:-
(1) प्रधान कान्यकुब्ज (2) सनाढ्य (3) सरवरिया (4) जिझौतिया (5) भूमिहार
वही 1807 ई० में बुकनान ने एक सर्वे रिपोर्ट में कहा है कि -
"भूमिहार अर्थात अयाचक ब्राह्मण एक ऐसी सवर्ण जाति जो अपने शौर्य, पराक्रम एवं बुद्धिमत्ता के लिये जानी जाती है। इसका गढ़ बिहार एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश है, पश्चिचमी उत्तर प्रदेश एवं हरियाणा में निवास करने वाले भूमिहार जाति अर्थात अयाचक ब्राह्मणों को त्यागी नाम की उप-जाति से जाना व पहचाना जाता हैं।"
एम.ए. शेरिंग ने 1872 में अपनी पुस्तक Hindu Tribes & Caste में कहा "भूमिहार जाति के लोग हथियार उठाने वाले ब्राह्मण हैं (सैनिक ब्राह्मण)। पं. परमेश्वर शर्मा ने 'सैनिक ब्राह्मण' नामक पुस्तक भी लिखी है।
अंग्रेज विद्वान मि. बीन्स ने लिखा है – "भूमिहार एक अच्छी किस्म की बहादुर प्रजाति है, जिसमें आर्य जाति की सभी विशिष्टताएं विद्यमान हैं। ये स्वाभाव से निर्भीक व हावी होने वालें होते हैं।"
'विक्रमीय संवत् 1584 (सन् 1527) मदारपुर के अधिपति भूमिहार ब्राह्मणों और बाबर से युद्ध हुआ और युद्धोपरांत भूमिहार मदारपुर से पलायन कर यू॰पी॰ एवं बिहार के बिभिन्न क्षेत्रों में फ़ैल गए
गौड़, कान्यकुब्ज सर्यूपारी, मैथिल, सारस्वत, दूबे और तिवारी आदि नाम प्राय: ब्राह्मणों में प्रचलित हुए, वैसे ही भूमिहार या भुइंहार नाम भी सबसे प्रथम कान्यकुब्ज ब्राह्मणों के एक अयाचक दल विशेष में प्रचलित हुआ।
यद्यपि इनकी संज्ञा प्रथम जमींदार या जमींदार ब्राह्मण थी लेकिन एक तो, उसका इतना प्रचार न था, दूसरे यह कि जब पृथक्-पृथक् दल बन गये तो उनके नाम भी पृथक-पृथक होने चाहिए परन्तु जमींदार शब्द तो जो भी जाति भूमिवाली हो उसे कह सकते हैं। इसलिए विचार हुआ कि जमींदार नाम ठीक नहीं हैं। क्योंकि पीछे से इस नामवाले इन अयाचक ब्राह्मणों के पहचानने में गड़बड़ होने लगेगी। इसी कारण से इन लोगों ने अपने को भूमिहार या भुइंहार कहना प्रारम्भ कर दिया। हालांकि जमींदार और भूमिहार शब्द समानार्थक ही हैं, तथापि जमींदार शब्द से ब्राह्मण से अन्य क्षत्रिय आदि जातियाँ भी समझी जाती हैं, परन्तु भूमिहार शब्द से साधारणत: प्राय: केवल अयाचक ब्राह्मण विशेष ही क्योंकि उसी समाज के लिए उसका संकेत किया गया हैं।
अंतिम निष्कर्ष -- भूमिहार या बाभन (अयाचक ब्राह्मण) एक ऐसी सवर्ण जाति है जो अपने शौर्य, पराक्रम एवं बुद्धिमत्ता के लिये जानी जाती है। बिहार, पश्चिचमी उत्तर प्रदेश एवं झारखण्ड में निवास करने वाले भूमिहार जाति अर्थात अयाचक ब्रहामणों को से जाना व पहचाना जाता हैं। मगध के महान पुष्य मित्र शुंग और कण्व वंश दोनों ही ब्राह्मण राजवंश भूमिहार ब्राह्मण (बाभन) के थे भूमिहार ब्राह्मण भगवन परशुराम को प्राचीन समय से अपना मूल पुरुष और कुल गुरु मानते है
भूमिहार ब्राह्मण समाज में उपाधिय है भूमिहार, पाण्डेय, तिवारी/त्रिपाठी, मिश्र ,शुक्ल ,उपाध्यय ,शर्मा, ओझा, दुबे-द्विवेदी इसके अलावा राजपाट और ज़मींदारी के कारन एक बड़ा भाग भूमिहार ब्राह्मण का राय, शाही, सिंह, उत्तर प्रदेश में और शाही, सिंह (सिन्हा), चौधरी (मैथिल से ), ठाकुर (मैथिल से ) बिहार में लिखने लगा
विशेष --
भूमिहार ब्राह्मण जाति ब्राह्मणों के विभिन्न भेदों और शाखाओं के अयाचक लोगों का एक संगठन ही है। प्रारंभ में कान्यकुब्ज शाखा से निकले लोगों को भूमिहार ब्राह्मण कहा गया, उसके बाद सारस्वत, महियल, सरयूपारी, मैथिल, चितपावन, कन्नड़ आदि शाखाओं के अयाचक ब्राह्मण लोग पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार में इन लोगो से सम्बन्ध स्थापित कर भूमिहार ब्राह्मणों में मिलते गए। मगध के बाभनो और मिथिलांचल के पश्चिमा तथा प्रयाग के जमींदार ब्राह्मण भी अयाचक होने से भूमिहार ब्राह्मणों में ही सम्मिलित होते गए।
भूमिहार या अयाचक ब्राम्हण राजा एवं जमीदार --
बनारस राज्य भूमिहार ब्राह्म्णों के अधिपत्य में 1725-1947 तक रहा।
इसके अलावा कुछ अन्य बड़े राज्य बेतिया, हथुवा, टिकारी, तमकुही, लालगोला इत्यादि भी भूमिहार ब्राह्म्णों के अधिपत्य में रहे।
बनारस के भूमिहार ब्राह्मण राजा ने अंग्रेज वारेन हेस्टिंग और अंग्रेजी सेना की ईट से ईट बजा दी थी।
1857 में हथुवा के भूमिहार ब्राह्मण राजा ने अंग्रेजो के खिलाफ सर्वप्रथम बगावत की।
अनापुर राज अमावा राज. बभनगावां राज भरतपुरा धरहरा राज शिवहर मकसुदपुर राज औसानगंज राज नरहन स्टेट जोगनी एस्टेट पर्सागढ़ एस्टेट (छपरा ) गोरिया कोठी एस्टेट (सिवान ) रूपवाली एस्टेट जैतपुर एस्टेट हरदी एस्टेट ऐनखाओं जमींदारी ऐशगंज जमींदारी भेलावर गढ़ आगापुर स्टेट पैनाल गढ़ लट्टा गढ़ कयाल गढ़ रामनगर जमींदारी रोहुआ एस्टेट राजगोला जमींदारी पंडुई राज केवटगामा जमींदारी घोसी एस्टेट परिहंस एस्टेट धरहरा एस्टेट रंधर एस्टेट अनापुर एस्टेट ( इलाहाबाद) चैनपुर मंझा मकसूदपुर रुसी खैरअ मधुबनी नवगढ़ - भूमिहार से सम्बंधित है असुराह एस्टेट कयाल औरंगाबाद में बाबु अमौना तिलकपुर ,शेखपुरा स्टेट जहानाबाद में तुरुक तेलपा स्टेट क्षेओतर गया बारों एस्टेट (इलाहाबाद) पिपरा कोय्ही एस्टेट (मोतिहारी) इत्यादि ये सभी अब इतिहास के गोद में समां चुके है ।
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References:
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Brown, Judith M. (26 September 1974). Gandhi's Rise to Power: Indian Politics 1915-1922.
"These days, their poster boys are goons". The Economic Times. 16 March 2004. Retrieved 2014-11-11.
Sajjad, Mohammad (13 August 2014). Muslim Politics in Bihar: Changing Contours.
Community Warriors. Anthem Press. p.128
Kayasthas in making of modern Bihar. Impression Publication. p. vi. J.P's most intimate friend was Ganga Sharan Singh, a Bhumihar

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