शर्म को शर्म रहने दो, बेशर्म न बनाओ । अगर वो बेशर्म बनी, तो तुम मर जाओगे ॥

शर्म, बलात्कार, महिलाएं, बिहिया-बिहार, आरा, भोजपुर, नितीश कुमार, thrashing-stripping-the-women-and-paraded-naked-in-bihiya-bhojpur-biharकैसे पुरूष हैं ये ? जो एक महिला को नग्न करके उसे दंडित करना बहुत बड़ा काम समझते हैं । क्या इन्हें पुरूष कहलाने का हक है भी ?

नग्नता की सज़ा देने को अपनी सजाओं की सूची से बाहर कीजिए, अगर औरतों ने विद्रोह कर नग्नता अपना ली, तो आपकी सारी स्थापित संरचनाएं ध्वस्त हो जाएंगी।

औरतों और महिलाओं ने आपके साम्राज्य को अपनी शर्म की बुनियाद से कायम किया है, अगर शर्म की बुनियाद हिल गई, तो आप न पिता रह पाएँगे, न पति, न भाई न कुछ और भी

समाज का हर रिश्ता कायम इसलिए है क्योंकि बेटियों, बहनों पत्नियों ने अपनी शर्म को बचा कर आपको इज़्ज़त से चल पाने की स्वछंदता दे रखी है।

किसी भी महिला को सज़ा देने नग्न करने, बलात्कार करने से पहले पुरुष समाज को उस दीनता का ध्यान रखना चाहिए कि उनका पुरुषत्व महिला की अपने महिला होने से उपजी लज्जा भाव में ही निहित है। अगर स्वयं महिलाएं अपनी स्वेच्छा से नग्न होने लगेंगी, फिर उनके पुरुष दम्भ का क्या होगा?

बिहार के भोजपुर जिले के बिहिया की घटना में न जाने किस बात पर एक औरत को भीड़ ने निर्वस्त्र किया। अगर उस लाल बत्ती इलाके की सारी महिलाएं नग्न होकर भीड़ के सामने खड़ी हो जाती, तो क्या कर सकती थी भीड़ उनका ? क्या कर वो भीड़ कर पाती बलात्कार सारी औरतों का ?

वेश्याएँ बहुत बुरी होती हैं न? बहुत बुरी? फिर क्यों जाते हैं आप उनके पास रात या दिन में भी? महिलाएं तो नहीं जाती वेश्याओं के पास। यह उनका पेशा है और मत भूलिए कि यह पेशा आप जैसे खरीदारों की वजह से फल-फूल रहा है।

दिन के उजाले में आप अगर किसी महिला को गलियों में निर्वस्त्र कर के घुमाते हैं, तो यह आपके सच्चरित्र होने का प्रमाण-पत्र नहीं है।

अगर वेश्याएँ निर्वस्त्र होकर गलियों में घूमने लगें, तो यह आपके द्वारा स्थापित सारी संरचनाओं पर एक जोरदार तमाचा होगा जिसका तोड़ आपके लिए ढूँढ पाना असंभव हो जाएगा।

कल्पना कीजिए कि नग्न कर जिसे पुरुष वर्ग ने घुमाया सड़कों पर, अगर वह दुबारा से वस्त्र पहनने से इंकार कर दे, तो आप उसे किस नैतिकता की दुहाई देंगे?

आप नैतिकता की दुहाई देने लायक बचे भी हैं?

अगर महिलाएं बलात्कार को बलात्कार मानना/कहना, स्वयं को पीड़ित बताना ही छोड़ दें, तो फिर आपके इस बलात्कार और निर्वस्त्रीकरण नामक हथियार का क्या होगा?

फिर किसे शर्माने को कहेंगे आप? किसे कहेंगे कि नज़रें झुका कर, दुपट्टा संभाल कर चलो। फिर हया और शर्म पर बनी तमाम शायरियों का क्या होगा और वे किनके लिए कही जाएंगी?

अपने समाज से कहिए कि प्रताड़ना की हद इतनी न करे कि प्रताड़ना का डर खत्म हो जाए, बलात्कार का डर न रहे, शर्म की ज़रूरत न रहे।

जब किसी की आंखों में शर्म नहीं बचेगी तो शर्माएगा कौन? किसे डराएंगे? किसे शर्माने को कहेंगे? और किसे न शर्माने पर अपनी जानदार गालियों का शब्दकोश न्योंछावर करेंगे?

फिर पुरुष ही कहाँ रह जाएँगे आप?

पुरूष का पुररुषत्व स्त्री को इज्जत और सम्मान देने में है उसे नग्न करके बेइज्जत करने में नहीं। अगर कोई पुरूष या समाज ऐसा करता है तो उसका पुरूषत्व दो कोढ़ी का है।

आगे आपकी मर्जी।

मन तो करता है कि इस घटना पर ऐसे पुरुष-समाज के लिए श्रद्धांजलि ही लिख दूँ !

बिहिया पर शर्मसार है क़लम

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