उमर खालिद पर अटैक "सच या एक ड्रामा"

13 अगस्त को Constitution Club of India के बाहर रोड पर स्थित चाय की दुकान के पास "उमर खालिद" पर हुये कथित गोली कांड पर दो अलग-अलग चश्मदीद गवाहों के बयान सुनने को मिले। दोनों के ही बयान एक दूसरे के विपरीत है। इनमें से पहले हैं "पत्रकार संतोष" और दूसरा है उमर का ही साथी "खालिद सैफी"।

इन दोनों के ही बयानों में बहुत ही अंतर है इस वीडियो में इन दोनों के ही बयानों को दिखाया गया है, सबसे बड़ी बात ये है कि जहां संतोष जी का बयान एक निष्पक्ष व्यक्ति का बयान कहा जा सकता या माना जा सकता है वहीं सैफी के बयान को बिना पूर्ण जाँच-पड़ताल के कैसे सही मान लें जबकि उसके बयान को तो वहाँ उपस्थित सिक्यूरिटी गार्ड ही काट रहा था, यहाँ तक कि वीडियो में अचानक रिकर्ड हुये उमर खालिद के हाव-भाव भी इस घटना के पीछे किसी प्लान/षडयंत्र का होना दिखा रहे हैं ।

अगर दोनों चश्मदीद गवाहों कि बात करें तो संतोष एक पत्रकार हैं जो वहाँ अक्सर आते रहते हैं और पत्रकारों कि निगाहें और कान वैसे भी तेज होते हैं इसके अलावा संतोष की निष्पक्षता पर शायद ही सवाल उठाया जा सके जबकि खालिद सैफी को निष्पक्ष नहीं कहा जा सकता क्योंकि वो उसी खालिद का साथी/दोस्त है जिसके साथ ये कथित घटना घटित हुई दिखाई जा रही है। इसके अलावा सैफी का व्यवहार भी उसके बयान को संदिग्ध बना रहा है क्योंकि अपने बयान पर अंगुली उठाते देख पुलिस के सामने ही सैफी बदतमीजी और गुंडागर्दी पर उतरता हुआ साफ दिखाई दे रहा है उसे तो इस बात कि भी कोई परवाह नहीं थी कि वहाँ मीडिया भी मौजूद था जो उसकी इस गुंडागर्दी को भी रिकर्ड कर रहा था

वहां उपस्थित सिक्योरिटी गार्ड जब उसकी बात काट रहा है या उसके हाँ में हाँ नहीं मिला रहा तो ये जनाब पहले तो उस गार्ड को गालियां देता है और जब गलियों से पेट नही भरता तो उस गार्ड के ऊपर हाथ उठाता है

वहां मौके पर उपस्थित पुलिस वाले एवं अन्य लोग जब इसे रोकते हैं तो ये पुलिस पर भी अपनी अकड़ दिखाता है और खालिद सैफ़ी पुलिस के ही सामने उस गार्ड को जान से मारने की धमकी भी देता है

इस सारे घटनाक्रम को देखकर तो ये ही लगता है कि ये पूरा ड्रामा खालिद गैंग या कहें तो JNUgang का जान-बूझकर रचाया हुआ एक पब्लिसिटी स्टंट मात्र था

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