प्रिय, सुज़न्ना अरुंधती रॉय के नाम खुला पत्र

हम भारतीय आपके बिना बेहतर कर सकते हैं!

इन सभी वर्षों में हम इस तथ्य के आदी हो चुके हैं कि आपको "ध्यान की असमानता" पसंद नहीं है, लेकिन हम पहले से ही आपको बहुत आवश्यक ध्यान देते-देते थक चुके हैं।

प्रेम, करुणा और देखभाल से भरी "घोर मानववादी" होने के आपके सभी दावों और घोषणाओं के बावजूद, मुझे यह बताना होगा कि भारतीयों को आपकी चिंता, ध्यान और अतिरिक्त प्रेम की आवश्यकता नहीं है और वे आपके बिना और बेहतर कर सकते हैं।

इस देश को अपने विकास और सुरक्षा हेतु आपके बहुमूल्य चिंतन और मार्गदर्शन की आवश्यकता नहीं है और हम ख़ुद ही इसे प्रबंधित कर सकने में सक्षम हैं।

आपको हमारे प्रधानमंत्री एक "त्रासदी" लगते हैं और आपके ध्यानाकर्षण करने की अनेक कोशिशों के बावजूद हम भारतीयों को भारतीय परिदृश्य में आपकी उपस्थिति एक "त्रासदी" लगती है जहाँ आप वो "लेडी मैकबेथ" सरीखी दिखती हैं जिसके,"दिमाग में खून" है।

दशकों से, अपने अतिरंजित और हाइपरबॉलिक स्टेटमेंट्स के माध्यम से संघर्षों और शब्दों के युद्ध से हमें उकसाया है और हम वास्तव में आपके घृणित उद्देश्यों से तंग आ गए हैं।

आप विदेशी देशों से पुरस्कार स्वीकार करती हैं, जो संरचनाओं को खत्म करने के आपके प्रयासों के लिए आपको दिए जाते हैं, चूँकि आपको ऐसी संरचनाओं से नफरत है और नागरिक समाजों में आपके काम के लिए भी जो दुनिया की सबसे शक्तिशाली सरकारों और निगमों द्वारा प्रतिकूल रूप से प्रभावित हैं।

पर देखिए न, विडंबना यह है कि हमें गर्व है कि हम उन,"शक्तिशाली देशों" में से एक हैं और आपके प्रयासों द्वारा शक्तिशाली माने जाते हैं। हमें यह सुखद एहसास से भर देता है कि 'आप' और 'वे' दोनों इस तथ्य से सहमत हैं।

कृपया भविष्य में अपने तथाकथित प्रतिष्ठित पुरस्कारों को लेने और लौटाने का सिलसिला जारी रखें, ताकि हम भी "डेनमार्क" होने की शक्ति का अनुभव कर खुश हो सकें जिसके पॉवर को कोई "लेडी मैकबेथ" कम नहीं कर सकती और जो तमाम साज़िशों और अंतर्विरोधों के बाद भी अक्षुण्ण रहा।

भारत की परमाणु नीतियों पर ज्ञान देना बिल्कुल ऐसा ही है जैसे हमें जैविक खेती की महत्ता पर पाठ पढ़ाना और खेतों में कीटनाशकों के प्रयोग से होने वाले नुकसान के बारे में शिक्षा देना।

हम सभी जैविक खेती के महत्व के बारे में जानते हुए भी केवल उस पर निर्भर नहीं रह सकते क्योंकि इतनी बड़ी जनसंख्या को खिलाने की चुनौती का सामना भी हमें ही करना है जिनमें कश्मीर, तेलंगाना, मिजोरम, नागालैंड, हैदराबाद इत्यादि जैसे राज्य भी हैं, जिन्हें आप ख़ुद ही की तरह हमसे आज़ाद करना चाहती हैं।

जिस तरह हम अंडर-प्रोडक्शन से पीड़ित होने के लिए जैविक-खेती का विकल्प नहीं चुन सकते, और भुखमरी का शिकार नहीं हो सकते ठीक उसी तरह राष्ट्र की सुरक्षा और परमाणु नीतियों का मुद्दा भी है। पर यह वही समझ सकता है, जिसे इस देश से लगाव हो।

बच्चों के लिए माओं की चिंताएं और उनके देख-रेख के तरीके आपको 'आतंक' समान लगते हैं। यह कहना आपके लिए काफ़ी आसान है क्योंकि आप क्या जाने एक माँ का दर्द आपके पास तो ऐसी कोई ज़िम्मेदारी नहीं। कभी हमारे जवानों की विधवाओं से मिल लीजिये, जो युद्ध में अपने पतियों को खो देने के बाद अकेले ही बच्चों की परवरिश करती हैं।

उस युद्ध में जिसे आप चाहती हैं कि केवल हम रोक दें। वह युद्ध, जो हम केवल अपने बचाव के लिए लड़ते हैं।

बहुत ही सूक्ष्म तरीके से, आप हमारे स्वतंत्रता-सेनानियों को आतंकवादी कह जाती हैं ताकि आपके आतंक परस्त लोगों का एजेंडा आगे बढ़ता रहे, उनके लिए कोर्ट खुलते रहें रातों को और याचिकाएं दायर होती रहें।

आपको चमड़े के काम को इंसानी हाथों द्वारा करवाने को बंद करवाना, बूचड़खानों को बंद करवाना बुरा और दोषपूर्ण लगता है। किस मानवता के चलते आप चाहती हैं कि लोग यही सारे काम करें और कोई अन्य उद्योग नहीं। आप और आपकी मानवता हमारे समझ के बाहर की चीज़ है। आप उन्हें कोई सभ्य व्यवसाय करते क्यों नहीं देख पातीं ?

आपके बौद्धिक elitism से हम त्रस्त हो चुके हैं। कुछ यूँ कीजिए कि एक उन्मुक्त पक्षी की उड़ान भर किसी ऐसे देश चले जाइये जहाँ आपके सपनों की दुनिया कायम हो सके।

पर हां, हम यह भी जानते हैं कि आपके पास जाने को कोई जगह नहीं, क्योंकि वो सारे देश तो हमसे भी ज़्यादा समृद्ध हैं, हमसे ज़्यादा युद्ध को लेकर उत्सुक और आगे हैं और अपनी सुरक्षा-मुद्दों को लेकर अत्यंत संवेदनशील। उन देशों में आपका दिली-स्वागत नहीं हो सकेगा, वो यह ज़रूर करेंगे कि आपको पुरस्कारों से नवाज़ दें ताकि आप अपने देश के भीतर और बाहर देश-विरोधी एजेंडा चला सकें।

वो शायद आपको ठहरने को न कहें, क्योंकि आप उनके शांत जीवन में एक अनुचित गतिरोध और अतिरिक्त परेशानी हो सकती हैं।

जब से आपने वो "अत्यंत निराशाजनक" और " घिनौनी" किताब लिखी है, जिसने आपको अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि दी, आपको इस देश और इसके राष्ट्रीय सरोकारों से नफ़रत हो गई। हम इस देश के लिए आपकी नफरत को समझ सकते हैं और जानते हैं कि आपके विचार राष्ट्रीय हितों से परे हैं।

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