Review जूली 2: कमजोर स्क्रीनप्ले ने लुटाया

Review जूली 2: कमजोर स्क्रीनप्ले ने लुटाया

निर्देशक: दीपक शिवदासानी
कलाकार: राय लक्ष्मी, रवि किशन, अनंत जोग, पंकज त्रिपाठी, निशिकांत कामत
जूली 2 के पहले बॉलीवुड में जो भी फिल्में फिल्म इंडस्ट्री के परिप्रेक्ष्य में बनी हैं उसमें उनकी बुराई तो की गई है लेकिन बड़े ही सहज तरीके से लेकिन जूली 2 ये सारी सीमाएं लांघ गई है, बल्कि ये कहना ठीक होगा कि कोई भी हद कम नज़र आती है.
मुमकिन है कि इसकी वजह इस फिल्म को बनाने वाले दीपक शिवदसानी खुद ही हैं. दीपक का फिल्म जगत में एक लम्बा करियर रहा है लेकिन जब से परिवर्तन की लहर फिल्म जगत में चलनी शुरू हुई है इसका असर कुछ लोगों पर भी पड़ा है खासकर के उन लोगों पर जो 90 के दशक में काफी सक्रिय थे. दीपक की पिछली फिल्म नौ साल पहले आई थीं और उसके बाद फिल्म जगत में बदलाव की लहर ने उनको फिल्म बनाने से एक तरह से रोक दिया था क्योंकि उनकी फिल्मों की विचारधारा अस्सी और नब्बे के दशक की ही थी.
जूली 2 पर उनकी पुरानी फिल्मों का हैंगओवर है जिसके ख़रीदार आज की तारीख में कम ही है और हां यहां पर मैं ये भी कहूंगा कि 2008 में रिलीज़ हुई नेहा धूपिया की फिल्म जूली से इसका किसी भी तरह से कोई लेना देना नहीं है.
कहानी
फिल्म की कहानी एक महत्वाकांक्षी अभिनेत्री जूली (राय लक्ष्मी) के बारे में है जो बॉलीवुड में अपनी पहचान बनाना चाहती है लेकिन उसे अपने अभिनय का जौहर दिखाने का मौका कहीं से मिल नहीं पाता. जब वो काम की तलाश में फिल्मों के प्रोड्यूसर्स और डायरेक्टर्स से मिलती है तो उसे हर जगह यही सुनने को मिलता है कि काम मिलने के लिए उसे समझौता करना पड़ेगा और कोई चारा नहीं होने के कारण वो समझौता करके एक स्टार ज़रूर बन जाती है लेकिन आगे चलकर उसे इसकी वजह से तमाम परेशानियों से भी जो चार होना पडता है.
उसकी जिंदगी में तूफान तब आता है जब उसके ऊपर हमला होता है और उसे शहर छोड़ने की धमकी मिलती है. धमकी में उसके ऊपर तेज़ाब फेंकने की भी बात कही जाती है. फिल्म के आखिर में एक एक करके परतें खुलती हैं और सभी चीजों का खुलासा होता है. जूली के इस फ़िल्मी सफर में जो पुरुष उसके सानिध्य में आते हैं और कैसे उसका इस्तेमाल करते हैं और किस तरह से जूली को हमेशा प्यार के बदले धोखा मिलता है ये सब कुछ फिल्म में दिखाया गया है. निर्देशक ने दो टूक राय अपनी फिल्म में दे दी है कि अगर किसी अभिनेत्री को स्टारडम की सीढ़ियां चढ़नी हैं तो उसे बाकी चीज़ों के लिए भी तैयार रहना पड़ेगा.
फिल्म की कहानी देख कर ये साफ़ जाहिर है कि किसी ज़माने में बॉलीवुड में काम करने वाली अभिनेत्री नग़मा जो आगे चल कर साउथ की फिल्मों की बड़ी स्टार बन गई थीं उनकी जिंदगी से प्रेरित है. फिल्म का वो पूरा हिस्सा जिसमें जूली और अभिनेता रवि कुमार (रवि किशन) के बारे में बात की गई है वो पूरी तरह से साउथ के अभिनेता शरत कुमार और अभिनेत्री नग़मा के रोमांस के ऊपर आधारित है.
लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं होता. आप निर्देशक को क्लीन चिट दे सकते हैं कि ये हिस्सा काल्पनिक है लेकिन जब जूली के अफेयर की बात एक क्रिकेटर से होती है तब इस बात का खुलासा पूरी तरह से हो जाता है की फिल्म के लेखक नग़मा और सौरव गांगुली के बारे में ही बात कर रहे हैं.
ताज्जुब इस बात को भी देख कर होता है कि फिल्म के निर्देशक दीपक शिवदसानी ने ही नग़मा को उनकी पहली हिंदी फिल्म बाग़ी मे मौका दिया थी. फिल्म के पुरुष कलाकारों की तरफ निर्देशक का रवैया एक जैसा ही है और उन्होंने सभी कलाकरों को एक रंग में ही रंग दिया है.
एक्टिंग
अभिनेत्री राय लक्ष्मी साउथ की फिल्मों की एक स्थापित कलाकार हैं और उनकी इस पहली फिल्म में काम शानदार है. एक ऐसी अभिनेत्री जिसका फायदा सभी उठाना चाहते हैं कि रोल में राय लक्ष्मी ने जान डाली दी है. जूली 2 के किरदार में उन्होंने सभी भाव डाले हैं जो इस किरदार में होने चाहिए थे. महत्वाकांक्षा से लेकर उनके टूटने तक ये सब कुछ राय लक्ष्मी ने सहज रुप से पर्दे पर चित्रित किया है. अभिनेता रवि कुमार के रोल में रवि किशन काफी जंचे हैं. आश्चर्य होता है की रवि किशन को बॉलीवुड ज्यादा रोल क्यों नहीं देता है. फिल्म में वरिष्ठ अभिनेता अनंत जोग भी है और जब भी वो परदे पर आते हैं उनको देखकर मन में घृणा के भाव ही उत्पन्न होते हैं. पंकज त्रिपाठी ने इस फिल्म में अपने रोल के लिए सहमति क्यों दी यह बात समझ से परे है.
इन दिनों चर्चा में है कास्टिंग काउच
हॉलीवुड के नामचीन प्रोड्यूसर हार्वे वाइंसटाईन के एक्सपोज़ होने के बाद ये फिल्म काफी महत्वपूर्ण हो जाती है. जूली 2 अपने ही तरीके से बताती है कि बॉलीवुड में जो भेड़िए छुपे हुए हैं उनको बाहर निकाल कर लाना एक बेहद ही जटिल काम है. इस फिल्म की सबसे बड़ी परेशानी है कि इसके ऊपर 90 के दशक की फिल्मों का खुमार छाया हुआ है. फिल्मों के कहानी कहने के अंदाज़ में अब ज़मीन आसमान का फर्क आ चुका है. एक ऐसी फिल्म जिसे आप थ्रिलर कहकर प्रचारित कर रहे हैं उसमे मेलोड्रामा का ज्यादा समावेश नहीं हो सकता है.
निर्देशन
मेलोड्रामा ऐसी फिल्मों में कहानी की गति को रोक देते हैं और दर्शकों को मौक मिल जाता है अपना फोन चेक करने का. जूली 2 की कहानी में कई ट्विस्ट्स भी हैं लेकिन हर बार वो दर्शकों को कहीं ना कहीं उलझा देता है. जब फिल्म की कहानी में इरोटिक सीन्स की भरमार हो जाती है तब इस बात का भी पता चल जाता है कि कहीं ना कहीं कहानी के साथ समझौता कर लिया गया है. जूली 2 के इरादे नेक हैं लेकिन स्क्रीनप्ले ने कहानी की जान ले ली है.

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